ज्वाला से ज्योति बनीं मां अष्टभुजा : 500 वर्षों से आस्था का अजस्र प्रवाह है नईगढ़ी धाम
Navratri 2026 : नईगढ़ी की पावन धरा पर अनादि शक्ति का अवतरण, नवरात्रि, हरियाली पुजाई पर उमड़ता है आस्था का जनसैलाब
जहां कभी सघन वन की नीरवता पसरी थी, जहां पगडंडियां भी मौन थीं, आज वहीं घंटा-घड़ियालों की मधुर ध्वनि और जयकारों से गूंजता है मां अष्टभुजा का पावन धाम। मऊगंज जिले के नईगढ़ी में विराजित यह सिद्धपीठ केवल मंदिर नहीं, अपितु पांच शताब्दियों की आस्था, इतिहास और चमत्कार की जीवंत कथा है।

लोक-श्रुति कहती है, आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व इस बीहड़ वन में अचानक अग्नि की प्रचंड लपटें आकाश छूने लगीं। वह दावानल नहीं, आदिशक्ति के अवतरण की दिव्य ज्वाला थी। उसी क्षण लालगंज के एक भोले-भाले यादव का वहां से गुजरना हुआ। वन को जलने से बचाने की नीयत से उसने लोटे का जल उस ज्वाला पर अर्पित कर दिया। अनजाने में ही सही, पर उसी जलाभिषेक से ज्वाला शांत हो पिंडी स्वरूप में परिवर्तित हो गई और वहीं स्थापित हो गईं मां अष्टभुजा।

माता ने दिया स्वप्न में आदेश, बसी नईगढ़ी
कहा जाता है उस काल में सेंगर वंश के प्रतापी राजा प्रताप सिंह वहां गढ़ी का निर्माण करा रहे थे। रात्रि में मां ने राजा को स्वप्न दिया - "यह भूमि मेरी आराधना के लिए है, यहां गढ़ी का निर्माण उचित नहीं। यह स्थान जन-जन की आस्था के लिए छोड़ दो।"

मां ने आदेश दिया कि प्रातः एक श्वेत खरगोश को श्यामवर्णी श्वान दौड़ाएगा, जहां वह उसे पकड़ेगा, वहीं नई गढ़ी बसाना। प्रभात में वैसा ही दृश्य साकार हुआ और राजा ने वर्तमान नईगढ़ी नगर बसाया। तभी से यह अंचल नईगढ़ी कहलाया।
इसी धाम के समीप बहने वाली देवलहा नदी के जल से अभिषेक करने की परंपरा से गांव का नाम देवीपुर पड़ा और कगास-हरफरी नदियों के संगम से बना प्रपात आज भी देवलहा जलप्रपात के नाम से विख्यात है।

अनवरत आस्था का केंद्र,135 वर्ष पुराना मंदिर
वर्तमान मंदिर का भव्य स्वरूप आज से लगभग 135 वर्ष पूर्व दुवगवां निवासी ब्राह्मण साधुराम कोड़रिया ने बनवाया था। कालांतर में मोतीलाल पांडेय सुमेदा, पटवारी राजेंद्र धर द्विवेदी हटवा सहित अनेक धर्मनिष्ठ भक्तों ने इसके जीर्णोद्धार में अपना तन मन धन अर्पित किया।
आज यह धाम केवल पूजा-स्थल नहीं, अपितु जीवन का उत्सव है। यहां बारह मास भक्तों की अविरल धारा बहती है। सोमवार-गुरुवार, नवरात्रि की नव-विभा और आषाढ़-श्रावण की हरियाली पुजाई पर तो जैसे पूरा अंचल ही मां के चरणों में उमड़ पड़ता है। मध्यप्रदेश ही नहीं, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक से लाखों श्रद्धालु शीश नवाने आते हैं।

मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मनौती यहां अवश्य पूरी होती है। श्रद्धालु कृतज्ञता में जीवित बकरा, जीभ तक अर्पित करते हैं और मां की असीम अनुकंपा से उनकी जीभ पुनः सहज हो जाती है। यहां मुंडन, कर्ण-छेदन, सत्यनारायण कथा, भजन-कीर्तन और भंडारे का अनवरत क्रम चलता है। मां के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता, हर कोई झोली भर कर ले जाता है।

इस सिद्धपीठ की छाया में सैकड़ों दुकानें सजी हैं, जिनसे हजारों परिवारों का जीवन-यापन मां के आशीर्वाद से हो रहा है। शासन-प्रशासन ने भी श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु धर्मशाला, पेयजल और सर्व-सुविधायुक्त सामुदायिक भवन का निर्माण कराया है। जिला प्रशासन द्वारा मेले के दौरान विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं, ताकि आस्था के इस महासागर में हर श्रद्धालु सुगमता से डुबकी लगा सके।


