पब्लिक वाणी खास खबर : अब तक 406 मौतें, 5804 जख्मी हुए... ऐसे में कैसे रुकेगा इंसान और वन्यजीवों की मौत का सिलसिला

Public Vani Khas Khabar : वन्यप्राणी बढ़े, लेकिन जंगल नहीं, कॉरिडोर के सिकुड़ने पर गांव बन गए संघर्ष के क्षेत्र

पब्लिक वाणी खास खबर : अब तक 406 मौतें, 5804 जख्मी हुए... ऐसे में कैसे रुकेगा इंसान और वन्यजीवों की मौत का सिलसिला

गणेश पाण्डेय @ भोपाल

मध्यप्रदेश में वन्यजीव संरक्षण की सफलता अब एक बेहद गंभीर सवाल के साथ सामने खड़ी है। ऐसा इसलिए कि वन्यजीवों की तादाद निश्चित तौर पर बढ़ी है और इसको लेकर विभाग अपनी पीठ भी थपथपा रहा है, लेकिन उनके रहवास के लिए घर यानी जंगल नहीं बढ़ाए गए हैं। इसकी कीमत इंसानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। नुकसान वन्य प्राणियों का भी हो रहा है, क्योंकि कॉरिडोर के सिकुड़ने से वे जंगल से बाहर आ रहे हैं और बहुत सारे मारे भी जा रहे हैं। यह छिटपुट समस्या नहीं है। पिछले पांच सालों में 406 लोगों की मौत वन्य प्राणियों के हमले में हो चुकी है और 5804 लोग जख्मी हुए हैं। 

आंकड़े बेहद गंभीर हैं और वे इस बात की गवाही देते हैं कि मानव और वन्यजीवों के बीच का संघर्ष अब छिटपुट घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा के लिए भारी संकट खड़ा कर चुका है। अकेले 2026 में जुलाई तक 50 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 22 मौतें बाघ, 8 जंगली सुअर, 7 हाथी, 4 भालू और एक तेंदुए के हमले में हुई ई है।

सबसे बड़ा सवाल हर मौत के बाद मुआवजा देने की व्यवस्था पर भी है। जब संघर्ष के हॉट स्पॉट चिन्हित हैं, वन्यजीवों के मूवमेंट और कॉरिडोर की जानकारी उपलब्ध है, तब उन इलाकों में पहले से चेतावनी तंत्र, नियमित निगरानी, प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम और ग्रामीण सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावी क्यों नहीं किया जा रहा है।

मुआवजा मौत के बाद, सुरक्षा मौत के पहले क्यों नहीं

सरकार की मौजूदा व्यवस्था में घटना के बाद मुआवजा, पोस्टमार्टम, पंचनामा और विभागीय कार्रवाई दिखाई देती है, लेकिन असली कसौटी यह होनी चाहिए कि जिस गांव को संघर्ष क्षेत्र के रूप में पहले से पहचाना जा चुका है, वहां घटना से पहले क्या किया गया।

क्या हॉटस्पॉट का वैज्ञानिक रिस्क-मैप तैयार किया गया, क्या ग्रामीणों तक तत्काल अलर्ट पहुंचाने की व्यवस्था है, क्या रात्रि और सुबह के संवेदनशील समय के लिए विशेष निगरानी है, क्या हर बड़े संघर्ष क्षेत्र में प्रशिक्षित रैपिड रिस्पॉन्स टीम उपलब्ध है, क्या वन्यजीव कॉरिडोर को सुरक्षित रखने की ठोस कार्ययोजना जमीन पर है। यह ऐसे सवाल है, जिनका जवाब विभाग को देना होगा।

बढ़ता टकराव सबसे बड़ी चुनौती

संघर्ष का बड़ा हिस्सा अब जंगल के भीतर नहीं, बल्कि जंगल की सीमा, खेतों, गांवों और वन्यजीवों के पारंपरिक आवागमन के मार्गों पर सामने आ रहा है। महुआ-तेंदूपत्ता संग्रहण, मवेशी चराने और जंगल से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने वाले ग्रामीण सीधे वन्य प्राणियों का शिकार हो रहे हैं।

उनके लिए भारी जोखिम है। समस्या सिर्फ वन्यजीवों की बढ़ती संख्या नहीं है, बल्कि आवास क्षेत्र, कॉरिडोर और मानव गतिविधियों के बीच बढ़ता टकराव असली चुनौती है। वन्यजीव अपने रास्तों पर है, लेकिन उन रास्तों पर मानवीय गतिविधियां बढ़ रही हैं। परिणाम यह हो रहा है कि एक ही भू-दृश्य में दो प्रजातियों का लगातार आमना-सामना हो रहा है।

अब रिस्पॉन्स नहीं, प्रिवेंशन मॉडल चाहिए

विशेषज्ञों का मानना है कि वन विभाग को अब घटना के बाद कार्रवाई की बजाय घटना से पहले रोकथाम की दिशा में आगे बढ़ना होगा। इसके लिए हॉटस्पॉट की वैज्ञानिक मैपिंग, कॉरिडोर संरक्षण, गांव-स्तरीय अलर्ट सिस्टम, प्रशिक्षित रैपिड रिस्पॉन्स टीम, सुरक्षित मानव गतिविधि कैलेंडर और वन्यजीवों की नियमित निगरानी को एकीकृत करना होगा।

तकनीक, शुरुआती चेतावनी, सामुदायिक भागीदारी, कॉरिडोर संरक्षण और अंतरराज्यीय समन्वय जैसे उपायों को कागज से निकालकर मैदानी सुरक्षा तंत्र में बदलना होगा। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगली मौत होने से पहले वन विभाग क्या करेगा।