मऊगंज में खनिज माफिया का तांडव: पहाड़ों का सीना छलनी, धूल से ग्रामीणों की सांसों पर संकट
पत्थर खदानों का काला खेल: अवैध उत्खनन के आरोप, प्रदूषण से गांवों की जिंदगी बेहाल, शासन के राजस्व को करोड़ों का चूना
मऊगंज से राजेंद्र पयासी की रिपोर्ट।
मऊगंज जिले को प्रकृति ने काले पत्थर के रूप में जो अनमोल वरदान दिया था, वही वरदान आज सीतापुर, हर्रहा, पिपराही से लेकर जड़कुड़ तक पूरे क्षेत्र के लिए जानलेवा अभिशाप बन गया है। वजह है खनिज विभाग की घोर लापरवाही और कथित मिलीभगत से पनप रहा माफिया का अवैध साम्राज्य। आलम यह है कि शासन-प्रशासन की नाक के नीचे एक दर्जन से अधिक स्टोन क्रेशर और अवैध खदानें दिन-रात बेखौफ संचालित हो रही हैं और जिम्मेदार अधिकारी कार्यवाही के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति कर रहे हैं।

कभी दो पहाड़ों के बीच बसा हरा-भरा खुशहाल इलाका कहलाने वाला सीतापुर से जड़कुड़ तक का पहाड़ी क्षेत्र आज मौत की घाटी में तब्दील हो गया है। ग्रामीणों के अनुसार पिछले 4-5 सालों में सुनियोजित तरीके से खनिज माफिया ने पूरे बेल्ट पर कब्जा कर लिया है। कई जगह बिना पर्यावरणीय स्वीकृति, बिना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी और बिना वैध लीज के पहाड़ों को खोखला किया जा रहा है। दिन में वैध खदान की आड़ में और रात में अवैध उत्खनन कर सैकड़ों हाईवा बोल्डर जिले से बाहर भेजे जा रहे हैं, जिससे शासन को प्रतिदिन लाखों रुपये के राजस्व की हानि हो रही है।

पर्यावरण खत्म, सेहत पर संकट
क्षेत्र के पिपराही, हर्रहा, दुधमनिया, मलकपुर, हर्रई गुजरान, केसरा, सरदमन और जड़कुड़ पहाड़ी की स्थिति सबसे भयावह है। यहां मानकों को ताक पर रखकर आबादी से महज 100 से 200 मीटर की दूरी पर क्रेशर प्लांट स्थापित कर दिए गए हैं। न जल छिड़काव की व्यवस्था है, न डस्ट व्यवस्थित करने की मशीनें। दिन-रात उड़ने वाली सिलिका युक्त विषाक्त धूल ने पूरे अंचल को अपनी चपेट में ले लिया है।

जमीनी हकीकत यह है कि प्रदूषण और बीमारी के भय से गांवों की लगभग आधी आबादी पलायन कर चुकी है। जो परिवार बचे हैं, वे दमा, श्वांस, टीबी और सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। खेतों में धूल की मोटी परत जमने से फसलें चौपट हो रही हैंछ जंगल उजड़ गए हैं और जलस्तर 150 फीट से नीचे चला गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि राजस्व, खनिज और प्रदूषण बोर्ड में कई बार शिकायत के बाद भी केवल कागजी कार्यवाही कर माफिया को क्लीन चिट दे दी जाती है।

आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल?
इलाके में चल रहे खनिज संपदा उत्खनन को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े पैमाने पर चल रहा अवैध कारोबार खनिज विभाग की नजर से कैसे बचा हुआ है? स्थानीय लोगों का स्पष्ट आरोप है कि विभागीय संरक्षण के बिना यह काला कारोबार संभव ही नहीं है। यदि समय रहते जिला प्रशासन ने सभी क्रशरों की भौतिक जांच, पर्यावरण ऑडिट और स्वास्थ्य शिविर लगाकर जांच नहीं कराई, तो प्राकृतिक संपदा से भरपूर यह पूरा क्षेत्र नक्शे से ही मिट जाएगा। ग्रामीणों ने मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

इस संबंध में खनिज अधिकारी सुनीत राजपूत से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। इससे पहले भी संपर्क करने पर उन्होंने फोन पर जानकारी देने से इंकार करते हुए कार्यालय में आने की बात कही थी। खनिज अधिकारी का इस तरह जवाब देना कई सवाल खड़े करता है, लेकिन हकीकत यह है कि मऊगंज में खनिज माफिया का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा और शासन के राजस्व को खुलेआम पलीता लगाया जा रहा है।

Varsha Shrivastava 
