NDPS Case : हाईकोर्ट ने पूछा- FIR लिखने वाले को कैसे बनाया जांच अधिकारी? चीफ जस्टिस ने बिलासपुर पुलिस पर उठाए सवाल
NDPS Case : चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने बिलासपुर पुलिस की NDPS एक्ट के तहत की गई कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
NDPS Case : छत्तीसगढ़। बिलासपुर के सरकंडा थाना क्षेत्र में 2925 कथित नशीली टैबलेट की बरामदगी से जुड़े NDPS मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने खास तौर पर इस बात पर आपत्ति जताई कि जिस ASI ने मामले में देहाती नालिश दर्ज की और जिसके आधार पर FIR हुई, उसी अधिकारी को जांच की जिम्मेदारी कैसे दी गई। कोर्ट ने इस मामले में DGP से शपथपत्र के साथ जवाब मांगा है।
महिला के घर से 2925 क्लोनाजेपाम टैबलेट मिलने का दावा
मामला सरकंडा थाना क्षेत्र के बंधवापारा का है। पुलिस ने एक महिला के घर दबिश देकर 2925 क्लोनाजेपाम यानी रिवोट्रिल टैबलेट बरामद करने का दावा किया था। पुलिस ने इन दवाओं को प्रतिबंधित और नशीला पदार्थ बताते हुए महिला के खिलाफ NDPS एक्ट के तहत केस दर्ज किया और उसे जेल भेज दिया। महिला करीब सात महीने से जेल में है। इस दौरान उसकी बच्ची और परिवार को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

भाई ने साजिश का आरोप लगाया
महिला के भाई ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसका दावा है कि उसकी बहन को सरकंडा पुलिस और उसके बहनोई रामकिशोर ने कथित साजिश के तहत मामले में फंसाया। उसने ASI शैलेंद्र सिंह की कथित मिलीभगत का आरोप भी लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। याचिका में परिवार ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
छत पर मिला था दवाओं से भरा बैग
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जिस पॉलिथीन बैग से कथित प्रतिबंधित दवाएं बरामद हुईं, वह महिला के पास से सीधे नहीं मिला था। परिवार का दावा है कि करीब 14 साल के बच्चे को पतंग उड़ाते समय यह बैग घर की छत पर मिला था।
बच्चे ने मोबाइल से दवाओं के बारे में जानकारी जुटाई और अपनी मां को बताया। परिवार का कहना है कि बैग को अनचाही वस्तु समझकर सीढ़ियों के पास कचरे की तरह रख दिया गया था। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई कर महिला को आरोपी बना दिया।

नाबालिग को 10 घंटे थाने में रखने का दावा
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 14 वर्षीय बच्चे के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं थी। इसके बावजूद पुलिस उसे थाने ले गई और करीब 10 घंटे तक वहां बैठाकर रखा गया। परिवार ने इस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि मामले की जांच निष्पक्ष तरीके से की जाए और बच्चे से जुड़ी परिस्थितियों को भी जांच का हिस्सा बनाया जाए।
बैग छत तक कैसे पहुंचा
परिवार ने पुलिस जांच में कई सवालों के जवाब तलाशने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सबसे पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि दवाओं से भरा बैग घर की छत तक कैसे पहुंचा और उसे वहां किसने रखा।
इसके साथ ही दवाओं के वास्तविक स्रोत की भी जांच होनी चाहिए। महिला की गिरफ्तारी किन परिस्थितियों में हुई, इसकी पड़ताल की मांग भी की गई है। याचिका में बच्चे का मोबाइल फोरेंसिक जांच के लिए उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है।
FIR के बाद उसी ASI ने की जांच
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने बताया गया कि ASI शैलेंद्र सिंह ने कथित तौर पर देहाती नालिश दर्ज की थी। इसी आधार पर FIR दर्ज हुई। इसके बाद उसी अधिकारी को मामले का जांच अधिकारी बनाया गया।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि जांच पूरी करने के बाद इसी अधिकारी ने महिला के खिलाफ चार्जशीट पेश की। इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए डिवीजन बेंच ने DGP से स्पष्टीकरण मांगा है।
ASI के पुराने रिकॉर्ड की भी जानकारी मांगी
हाईकोर्ट ने DGP को जांच अधिकारी ASI शैलेंद्र सिंह के पिछले आचरण और रिकॉर्ड की जानकारी भी पेश करने का निर्देश दिया है। इससे मामले में पुलिस की भूमिका और जांच की निष्पक्षता को लेकर उठे सवाल और महत्वपूर्ण हो गए हैं।
मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी। DGP के शपथपत्र के बाद कोर्ट आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेगा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर न्यायिक आदेश और केस संबंधी जानकारी उपलब्ध है।
क्या होती है देहाती नालिश
देहाती नालिश किसी अपराध के संबंध में पुलिस को दी जाने वाली शुरुआती सूचना या बयान होता है। यह सूचना अपराध स्थल पर या थाने पहुंचने से पहले पुलिस अधिकारी को दी जा सकती है। इसके आधार पर आगे FIR दर्ज की जा सकती है।
इसी वजह से इस मामले में शिकायत या शुरुआती सूचना दर्ज करने वाले अधिकारी को ही जांच सौंपे जाने का मुद्दा हाईकोर्ट के सामने अहम बना है। कोर्ट अब DGP के जवाब के आधार पर जांच प्रक्रिया को लेकर आगे का रुख तय करेगा।

