Bicycle Scheme Case : लोकायुक्त- EOW बने भ्रष्टाचार का अड्डा! हाई कोर्ट ने DG को 60 दिन में जांच पूरी करने के दिए निर्देश

Bicycle Scheme Case : कोर्ट ने DG उपेंद्र जैन को तलब किया। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए EOW और लोकायुक्त को भ्रष्टाचार का अड्डा बताया।

Bicycle Scheme Case : लोकायुक्त- EOW बने भ्रष्टाचार का अड्डा! हाई कोर्ट ने DG को 60 दिन में जांच पूरी करने के दिए निर्देश

Bicycle Scheme Case : जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी साइकिल योजना (Government Bicycle Scheme) से जुड़े पुराने मामले में जांच में हो रही देरी पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी EOW की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। मामले में EOW के DG आईपीएस उपेंद्र जैन (IPS Upendra Jain) को कोर्ट में मौजूद रहने के निर्देश दिए गए थे। शुक्रवार को DG कोर्ट में पेश हुए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जांच में लंबे समय तक हुई देरी को गंभीरता से लिया और पूरे मामले की जांच कराने के निर्देश दिए।

2013-14 की साइकिल योजना से जुड़ा है मामला

यह मामला रायसेन जिले के बरेली क्षेत्र के एक स्कूल से जुड़ा है। साल 2013-14 में कक्षा 9 के पात्र विद्यार्थियों के लिए सरकारी साइकिल योजना लागू थी। स्कूल को 40 छात्रों के लिए कुल 96 हजार रुपए मिले थे। प्रत्येक छात्र के लिए 2,400 रुपए तय थे। आरोप है कि आठ छात्रों को उनकी राशि नहीं मिली। इन आठ छात्रों की कुल रकम 19,200 रुपए थी। शिकायत के बाद मामला EOW तक पहुंचा और FIR दर्ज की गई।

आठ छात्रों की रकम दूसरे नामों से निकली

EOW के जवाब के अनुसार आठ छात्रों की राशि अलग-अलग चेक के जरिए निकाली गई थी। तीन चेक उमराव सिंह धाकड़ के नाम बताए गए हैं। इनकी कुल राशि 7,200 रुपए थी। तीन चेक सीमा धाकड़ के नाम बताए गए, जिनकी कुल राशि भी 7,200 रुपए थी। इसके अलावा सुरेश कुमार शर्मा और सोनू शर्मा के नाम से एक-एक चेक बताया गया है। दोनों चेक की राशि 2,400-2,400 रुपए थी।

6 लोगों को बनाया था आरोपी

EOW ने इस मामले में छह लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य सुंदर लाल शिल्पी, नवल किशोर शर्मा, उमराव सिंह धाकड़, सीमा धाकड़, सुरेश कुमार शर्मा और सोनू शर्मा के नाम शामिल हैं। याचिकाकर्ता शिक्षकों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि सरकारी राशि का निजी इस्तेमाल नहीं किया गया था। शिक्षकों ने बाद में FIR और उसके आधार पर चल रही कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

2015 में दर्ज हुई थी FIR

EOW भोपाल ने 7 दिसंबर 2015 को इस मामले में FIR दर्ज की थी। इसका अपराध क्रमांक 41/2015 बताया गया है। FIR में धोखाधड़ी, विश्वासघात और जालसाजी से जुड़ी धाराएं लगाई गई थीं। भ्रष्टाचार निवारण कानून की धाराएं भी जोड़ी गई थीं। बाद में आपराधिक साजिश से जुड़ी धारा भी शामिल की गई। EOW के अनुसार मूल चालान 6 जून 2018 को पेश किया गया था।

मंजूरी मिलने के बाद भी आगे नहीं बढ़ी कार्रवाई

मामले में अभियोजन की मंजूरी का मुद्दा बाद में सामने आया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मंजूरी मिलने के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। EOW ने अपने हलफनामे में बताया कि विभाग से मूल मंजूरी पत्र उपलब्ध नहीं हो पाया था। कई बार केवल उसकी फोटो कॉपी भेजी गई। EOW के अनुसार जिला पंचायत रायसेन से भी इस संबंध में पत्राचार किया गया, लेकिन मूल दस्तावेज नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

2021 के दस्तावेज में भी बताई गई थी खामी

EOW के अनुसार 2021 में मंजूरी से जुड़ी फाइल सामने आई। इसमें आदेश के साल और अधिकारी के नाम को लेकर स्पष्टता नहीं थी। जांच अधिकारी ने तत्कालीन CEO से दस्तावेज की पुष्टि कराई। EOW के मुताबिक CEO पीसी शर्मा ने दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर होने की पुष्टि की। इसके बाद आदेश में दर्ज साल की गलती सुधारी गई। EOW ने बताया कि इसके बाद पूरक चालान तैयार किया गया और 8 जून 2026 को कोर्ट में पेश किया गया।

हाई कोर्ट EOW के जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ

EOW ने अपने हलफनामे में जांच अधिकारी की गलती से इनकार किया था। विभाग ने देरी के लिए मुख्य रूप से जिला पंचायत से मूल मंजूरी दस्तावेज नहीं मिलने को जिम्मेदार बताया। हालांकि हाई कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने EOW के DG को खुद पेश होने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान जांच की गति और जिम्मेदारी तय करने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए।

जांच अधिकारी की भूमिका पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने लंबे समय तक मामला आगे नहीं बढ़ने को लेकर सवाल किया। कोर्ट की ओर से मौखिक टिप्पणी में जांच अधिकारी की भूमिका और संभावित आर्थिक लाभ के पहलू पर भी सवाल उठाया गया। EOW की ओर से इस आरोप से इनकार किया गया। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने विभाग का पक्ष रखा और कहा कि देरी के लिए जांच अधिकारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

DG ने कार्रवाई का दिया भरोसा

EOW के DG उपेंद्र जैन ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि मामले में जो भी अधिकारी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने जांच अधिकारियों के काम की समीक्षा कराने की बात भी कही। अब इस पूरे मामले में अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाएगी। कोर्ट के निर्देश के बाद EOW को अपनी कार्रवाई और जांच की प्रगति पर रिपोर्ट देनी होगी।

60 दिन में पूरी करनी होगी जांच

हाई कोर्ट ने EOW के DG को 60 दिन के भीतर पूरी जांच कराने के निर्देश दिए हैं। जांच में यह तय करना होगा कि मामले में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है। संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी स्पष्ट करनी होगी। इसके बाद जांच रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश की जाएगी। फिलहाल हाई कोर्ट ने शिक्षकों के खिलाफ FIR को रद्द करने का अंतिम फैसला नहीं दिया है। अब मामले की अगली दिशा 60 दिन की जांच रिपोर्ट से तय होगी।