उमंग सिंघार की बड़ी जीत: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- निर्मला सप्रे की विधायकी पर 2 महीने में फैसला करें स्पीकर
निर्मला सप्रे की सदस्यता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 2 साल से लंबित दल-बदल मामले में स्पीकर को मिली 2 महीने की मोहलत, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार बोले- जनादेश से विश्वासघात करने वालों को जवाबदेह बनाना जरूरी
मध्य प्रदेश की राजनीति में बीना विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता उमंग सिंघार की याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को निर्मला सप्रे के खिलाफ लंबित दल-बदल याचिका पर दो महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया है।
करीब ढाई साल से चल रहे इस मामले में अब विधानसभा अध्यक्ष को तय समयसीमा में निर्णय लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत आने वाली अयोग्यता याचिकाओं का जल्द निपटारा किया जाना चाहिए। हालांकि, शीर्ष अदालत ने अभी निर्मला सप्रे की सदस्यता समाप्त करने का कोई आदेश नहीं दिया है। अंतिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष को ही करना होगा।
पहले जानें क्या है पूरा मामला?
निर्मला सप्रे साल 2023 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से विधायक चुनी गई थीं। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान 5 मई को वह सागर जिले के राहतगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यक्रम में पहुंचीं। यहां मुख्यमंत्री की मौजूदगी में उन्होंने भाजपा के मंच से पार्टी में शामिल होने का ऐलान किया था। भाजपा नेताओं ने उनका स्वागत भी किया था।

इसके बाद कांग्रेस ने इसे दल-बदल का मामला बताते हुए उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई। कांग्रेस का आरोप था कि निर्मला सप्रे ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद पार्टी छोड़कर भाजपा का साथ दिया। यह संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन है। हालांकि, निर्मला सप्रे ने कांग्रेस छोड़ने और भाजपा की औपचारिक सदस्यता लेने के आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना रहा है कि वह कांग्रेस में ही हैं और उन्होंने पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया है।
उमंग सिंघार ने स्पीकर के सामने लगाई थी याचिका
निर्मला सप्रे के भाजपा के मंच पर पहुंचने और पार्टी में शामिल होने का ऐलान करने के बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 30 जून 2024 को विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के सामने उनकी सदस्यता समाप्त करने के लिए आवेदन दिया था।
<blockquote class="twitter-tweet"><p lang="hi" dir="ltr">निर्मला सप्रे के दल-बदल मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश। विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने के भीतर फैसला लेने को कहा गया। कांग्रेस ने इसे जनता के जनादेश और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत बताया। #NirmalaSapre #SupremeCourt #MPPolitics #MadhyaPradesh #Congress https://t.co/17U2bPYDmc</p>— Public Vani News (@publicvaninews) <a href="https://x.com/publicvaninews/status/2117910865873936865?ref_src=twsrc%5Etfw">November 4, 2026</a></blockquote> <script async src="https://platform.x.com/widgets.js" charset="utf-8"></script>
कांग्रेस का कहना था कि याचिका दिए जाने के बावजूद लंबे समय तक इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। करीब 90 दिन बीतने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर पार्टी ने न्यायालय का रुख किया। सिंघार ने अदालत से मांग की थी कि निर्मला सप्रे के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की जाए और उनकी सदस्यता समाप्त करने के मामले में समयसीमा तय की जाए।
हाईकोर्ट से नहीं मिली थी राहत, SC पहुंची कांग्रेस
विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर मामले का निराकरण नहीं होने पर उमंग सिंघार ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। नवंबर 2025 में हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष और निर्मला सप्रे को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। जून 2026 में सुनवाई के दौरान निर्मला सप्रे ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि उन्होंने न तो कांग्रेस छोड़ी है और न ही भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है। उन्होंने कांग्रेस में ही बने रहने की बात कही थी।

25 जून 2026 को हाईकोर्ट ने उमंग सिंघार की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट का कहना था कि निर्मला सप्रे के कांग्रेस से इस्तीफा देने या भाजपा में शामिल होने के पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं किए गए हैं। साथ ही विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष इस मामले में कार्यवाही लंबित होने के कारण अदालत ने हस्तक्षेप को उचित नहीं माना।
इसके बाद कांग्रेस ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अब शीर्ष अदालत ने इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने क्यों दिया दो महीने में फैसले का निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। उमंग सिंघार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने पैरवी की।
सुनवाई के दौरान दल-बदल विरोधी कानून के तहत दायर याचिकाओं के लंबे समय तक लंबित रहने का मुद्दा उठाया गया। विवेक तन्खा ने अदालत के सामने तर्क रखा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत आने वाले मामलों का समय पर निराकरण होना जरूरी है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दल-बदल से जुड़े मामलों में अयोग्यता याचिकाओं का शीघ्र निपटारा किया जाना चाहिए। यह जिम्मेदारी केवल इसलिए खत्म नहीं हो जाती कि हाईकोर्ट को मामले में तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत महसूस नहीं हुई। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने के भीतर निर्मला सप्रे के खिलाफ लंबित याचिका पर फैसला करने का निर्देश दिया।
लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की गरिमा मजबूत होगी
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की गरिमा को मजबूत करने वाला फैसला बताया। उन्होंने शीर्ष अदालत का आभार जताते हुए कहा कि हमारी याचिका पर सुनवाई करते हुए विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए गए हैं।
उमंग सिंघार ने कहा कि जनता ने निर्मला सप्रे को कांग्रेस के टिकट पर चुनकर विधानसभा भेजा था। जनादेश के साथ विश्वासघात करने वालों को दल-बदल कानून के तहत जवाबदेह बनाना जरूरी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि विधानसभा अध्यक्ष इस मामले में शीघ्र, निष्पक्ष और न्यायसंगत निर्णय लेंगे। साथ ही कहा कि लोकतंत्र में जनता के जनादेश की गरिमा और संवैधानिक मर्यादाओं को बनाए रखना जरूरी है।
क्या अब चली जाएगी निर्मला सप्रे की विधायकी?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब सबकी नजर विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के फैसले पर रहेगी। उन्हें दो महीने के भीतर यह तय करना होगा कि निर्मला सप्रे के खिलाफ लगाए गए दल-बदल के आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या उनके खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्रवाई बनती है।
फिलहाल निर्मला सप्रे की विधायकी समाप्त नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल मामले के समयबद्ध निराकरण का निर्देश दिया है। ऐसे में आने वाले दो महीने मध्य प्रदेश की राजनीति के लिहाज से काफी अहम माने जा रहे हैं। यदि विधानसभा अध्यक्ष उनके खिलाफ अयोग्यता का फैसला लेते हैं तो बीना विधानसभा सीट की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

