संजू सैमसन के चयन में दोहरे मापदंड क्यों?
संजू सैमसन को प्लेइंग इलेवन से बाहर किए जाने के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। क्या चयन प्रक्रिया में दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं?
एक बार फिर संजू सैमसन को भारतीय टीम की प्लेइंग इलेवन से बाहर कर दिया गया। सवाल यह नहीं है कि वैभव सूर्यवंशी को मौका क्यों मिला। एक युवा खिलाड़ी अपनी प्रतिभा के दम पर अवसर का हकदार है और इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या हाल ही में रन बनाने वाले खिलाड़ी को बाहर करना उचित है?

यही बात इसलिए भी चर्चा का विषय बन गई है क्योंकि कुछ ही मैच पहले भारतीय टीम के बॉलिंग कोच मोर्ने मोर्केल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, "हम किसी ऐसे खिलाड़ी को सिर्फ इसलिए ड्रॉप नहीं करेंगे, जिसने रन बनाए हों, ताकि किसी दूसरे खिलाड़ी को मौका दिया जा सके।" यह बयान चयन प्रक्रिया में निरंतरता और प्रदर्शन को प्राथमिकता देने का संदेश देता था। लेकिन मौजूदा फैसला उसी बयान से अलग तस्वीर पेश करता है।

इस फैसले के बाद एक और सवाल लगातार उठ रहा है—क्या वैभव सूर्यवंशी के डेब्यू को लेकर बने माहौल और सोशल मीडिया पर चल रही मांग का चयन प्रक्रिया पर किसी स्तर पर प्रभाव पड़ा? इसका कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है, लेकिन जिस तरह यह चर्चा तेज़ हुई है, उसने टीम प्रबंधन की चयन प्रक्रिया पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो टीम प्रबंधन को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि संजू सैमसन को बाहर करने का क्रिकेटिंग आधार क्या था।
एक और सवाल उपकप्तानी (Vice-captaincy) को लेकर भी उठता है। यदि किसी खिलाड़ी को केवल इसलिए बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि वह उपकप्तान है, तो फिर इस पद का वास्तविक महत्व क्या है? जब लगभग हर दूसरी सीरीज में नया उपकप्तान घोषित किया जाता है, तो क्या यह पद प्रदर्शन से भी ऊपर हो जाना चाहिए?
भारतीय क्रिकेट में बड़े फैसले पहले भी लिए गए हैं। कप्तान तक को सीरीज के दौरान आराम दिया गया है और बड़े खिलाड़ियों को विश्व कप जैसी महत्वपूर्ण टीमों से बाहर रखा गया है। ऐसे में यदि अलग-अलग खिलाड़ियों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए जाते हैं, तो चयन प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

यह लेख वैभव सूर्यवंशी के चयन के खिलाफ नहीं है। यह केवल चयन नीति में एकरूपता, पारदर्शिता और स्पष्टता की मांग करता है। यदि प्रदर्शन ही चयन का आधार है, तो वही नियम हर खिलाड़ी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। क्रिकेट में कठिन फैसले स्वीकार किए जा सकते हैं, लेकिन दोहरे मापदंड नहीं। टीम प्रबंधन की विश्वसनीयता केवल फैसलों से नहीं, बल्कि उन फैसलों में दिखाई देने वाली निष्पक्षता और निरंतरता से बनती है।
Anubhav Dubey 
