Kuno Cheetah Death : कूनो में शिकारियों की गोली से चीते की मौत, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

Kuno Cheetah Death : मध्यप्रदेश में मादा चीता निर्वा के 19 माह के शावक की इलाज के दौरान मौत हो गई। पेट में छर्रे मिलने से शिकार की आशंका है। वन विभाग मामले की जांच कर रहा है।

Kuno Cheetah Death : कूनो में शिकारियों की गोली से चीते की मौत, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

Kuno Cheetah Death : भोपाल। मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चीतों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मादा चीता निर्वा के 19 माह के नर शावक की शिकारियों के हमले में घायल होने के बाद मौत हो गई। शावक मोरेना के जंगल में गंभीर हालत में मिला था। उसे तत्काल उपचार के लिए वन विभाग की टीम ने रेस्क्यू किया और बेहतर इलाज के लिए जबलपुर भेजा गया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका।

प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, शावक के पेट में धातु के तीन से चार छर्रे मिले थे। इससे आशंका जताई गई कि उस पर किसी देशी हथियार अथवा भरमार बंदूक से गोली चलाई गई थी। हालांकि, घटना में इस्तेमाल हथियार और हमले की परिस्थितियों को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा।

इस घटना ने कूनो प्रबंधन और चीता परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रेडियो कॉलर, निगरानी दल और नियमित गश्त के दावों के बावजूद शिकारी संरक्षित वन्यजीव को निशाना बनाने में कैसे सफल हो गए? यदि चीते की गतिविधियों की लगातार निगरानी की जा रही थी, तो हमले की जानकारी समय रहते क्यों नहीं मिल पाई?

बताया जा रहा है कि घटना की गंभीरता को देखते हुए मध्यप्रदेश के मुख्य वन्यजीव अभिरक्षक (CWLW) ने विशेष टीम को कूनो और आसपास के क्षेत्र में भेजा है। जांच का प्रमुख बिंदु यह भी है कि शावक पार्क क्षेत्र से बाहर कैसे पहुंचा और उसके आसपास शिकारियों की गतिविधियां कितने समय से सक्रिय थीं।

इस घटना ने चीता परियोजना के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब तक चीतों की मौत के मामलों में बीमारी, आपसी संघर्ष और अन्य प्राकृतिक कारण चर्चा में रहे हैं, लेकिन यदि जांच में शिकारियों द्वारा गोली चलाने की पुष्टि होती है तो यह सुरक्षा प्रबंधन की बड़ी विफलता मानी जाएगी।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर संचालित की जा रही चीता परियोजना में वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई निगरानी व्यवस्था आखिर किस काम आ रही है? शिकारियों तक पहुंचकर कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम ही वन विभाग की असली परीक्षा होगी।