मऊगंज में करंट से हाथी की मौत, लेकिन बड़ा सवाल- जंगल छोड़ गांव तक पहुंचा क्यों गजराज?

मऊगंज के मालकपुर में बिजली के तार की चपेट में आने से 15-20 साल के हाथी की मौत हो गई। घटना के बाद खनन, घटते जंगल, बिजली के तार और हाथियों के सुरक्षित कॉरिडोर पर सवाल उठ रहे हैं।

मऊगंज में करंट से हाथी की मौत, लेकिन बड़ा सवाल- जंगल छोड़ गांव तक पहुंचा क्यों गजराज?

मऊगंज: मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के मालकपुर गांव में बिजली के तार की चपेट में आने से एक जंगली हाथी की मौत हो गई। हाथी की उम्र करीब 15 से 20 साल बताई जा रही है। प्रारंभिक जांच में करंट लगना मौत की वजह मानी जा रही है, जबकि पोस्टमार्टम के बाद मौत के कारण की पुष्टि की जाएगी।

लेकिन यह घटना सिर्फ एक हाथी की करंट से मौत की कहानी नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि हाथी मऊगंज के गांव और खेतों तक पहुंचा ही क्यों?

2018 में छत्तीसगढ़ से बांधवगढ़ पहुंचा था हाथियों का झुंड

मध्य प्रदेश में हाथियों की मौजूदगी पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। 2018 में करीब 40 हाथियों का एक झुंड छत्तीसगढ़ से निकलकर बांधवगढ़ पहुंचा था। इसे मध्य प्रदेश में हाथियों की नई मौजूदगी की महत्वपूर्ण घटना माना गया। इसके बाद हाथियों की आवाजाही पूर्वी मध्य प्रदेश के कई इलाकों में देखी गई।

इनमें शामिल कुछ हाथी बाद में नए इलाकों की तलाश में आगे बढ़े। मऊगंज तक पहुंचे हाथियों की आवाजाही इसी बड़े बदलाव का हिस्सा मानी जा रही है।

मालकपुर में कैसे हुई हाथी की मौत?

मालकपुर गांव में हाथी की मौत बिजली के तार की चपेट में आने से हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, हाथी एक अमरूद के पेड़ के पास पहुंचा था और इसी दौरान नीचे लटक रहे बिजली के तार के संपर्क में आ गया। करंट लगने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

घटना के बाद वन विभाग और बिजली विभाग की टीमें मौके पर पहुंचीं। एक अन्य हाथी भी मृत हाथी के आसपास मौजूद रहा, जिसके चलते वन विभाग की टीम को काफी सावधानी से रेस्क्यू और निगरानी करनी पड़ी।

सवाल सिर्फ बिजली के तार का नहीं

हाथी की मौत के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिजली का तार इतना नीचे क्यों था और वन्यजीवों की आवाजाही वाले क्षेत्र में सुरक्षा के क्या इंतजाम थे।

लेकिन समस्या को सिर्फ एक बिजली के तार या किसी एक अधिकारी की लापरवाही तक सीमित करना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

मऊगंज और आसपास के इलाकों में जंगल, खेती, गांव, सड़क और खनन गतिविधियां एक-दूसरे के करीब हैं। ऐसे बदलते लैंडस्केप में हाथियों के लिए सुरक्षित आवागमन और भोजन के प्राकृतिक क्षेत्र सीमित होते हैं। परिणामस्वरूप उनके खेतों और आबादी वाले इलाकों में पहुंचने की संभावना बढ़ती है।

खनन और बदलता लैंडस्केप बढ़ा रहा चुनौती

मालकपुर के आसपास बलुआ पत्थर की खदानों की मौजूदगी भी इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है। खनन और अन्य निर्माण गतिविधियों से जंगल के हिस्सों के बीच संपर्क प्रभावित हो सकता है।

हाथियों जैसे बड़े वन्यजीवों के लिए सिर्फ जंगल का मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। उन्हें एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाने के लिए सुरक्षित कॉरिडोर, पानी और भोजन के स्रोत भी चाहिए।

अगर ये रास्ते टूटते हैं, तो हाथी खेतों और बस्तियों की तरफ बढ़ सकते हैं। इससे मानव-हाथी संघर्ष की संभावना बढ़ती है और बिजली के तार, सड़क या दूसरी मानवीय संरचनाएं उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

मौसम की चरम घटनाएं भी बढ़ा रही चुनौती

मध्य भारत में बदलते मौसम का पैटर्न भी इस समस्या को और जटिल बना रहा है। IITM से जुड़े वैज्ञानिकों की Nature Communications में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, 1950 से 2015 के बीच मध्य भारत में व्यापक स्तर पर होने वाली अत्यधिक बारिश की घटनाओं में करीब तीन गुना वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि में औसत मानसूनी बारिश में गिरावट दर्ज की गई।

ऐसे मौसम में जब जंगल पहले ही सड़कों, खनन, बिजली के ढांचे और दूसरी मानवीय गतिविधियों से बंट रहे हों, तो वन्यजीवों के लिए सुरक्षित जगह और रास्ते तलाशना और मुश्किल हो सकता है।

हाथी को सिर्फ ‘वन्यजीव’ नहीं, पूरा लैंडस्केप चाहिए

मध्य प्रदेश में हाथियों की मौजूदगी अब केवल बांधवगढ़ तक सीमित कहानी नहीं है। 2018 में छत्तीसगढ़ से आए हाथियों के बाद पूर्वी मध्य प्रदेश में उनकी गतिविधियां दर्ज होती रही हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से संबंधित एक प्रकाशन में भी बताया गया है कि हाथियों के आवास में बदलाव और छोटे वन क्षेत्रों की ओर उनके जाने की वजह से उनकी आवाजाही छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तक हुई।

ऐसे में हाथियों की सुरक्षा के लिए सिर्फ वन विभाग की निगरानी काफी नहीं होगी। इसमें खनन की अनुमति, बिजली के तारों की ऊंचाई और सुरक्षा, सड़क निर्माण, भूमि उपयोग की योजना और वन्यजीव कॉरिडोर—सभी को एक साथ देखना होगा।

असली सवाल यही है...

मालकपुर में एक हाथी की मौत हो गई। जवाबदेही तय होना जरूरी है। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि बिजली का तार सुरक्षित मानकों के अनुरूप था या नहीं और वन्यजीवों की मौजूदगी वाले क्षेत्र में जरूरी सावधानियां बरती गई थीं या नहीं।

लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा है

अगर हाथियों के पुराने जंगल सिकुड़ रहे हैं और उनके सुरक्षित रास्ते लगातार टूट रहे हैं, तो वे जाएंगे कहां? मऊगंज में हाथी की मौत को सिर्फ ‘करंट लगने का हादसा’ मानकर मामला खत्म कर देना आसान है। मुश्किल सवाल यह है कि हाथी उस बिजली के तार तक पहुंचा ही क्यों? यही सवाल आने वाले समय में सिर्फ मऊगंज नहीं, बल्कि मध्य भारत में इंसान और हाथियों के बीच बढ़ते टकराव की दिशा तय करेगा।