भोपाल में नशामुक्ति अभियान के बीच अवैध आहते पर सवाल: सड़क किनारे छलकते जाम, जिम्मेदार कौन?
भोपाल में नशामुक्ति अभियान के बीच शराब दुकानों और आसपास कथित अवैध आहतों में खुलेआम शराब सेवन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों ने प्रशासन और आबकारी विभाग से जांच व कार्रवाई की मांग की है।
भोपाल। राजधानी भोपाल में एक तरफ सरकार और प्रशासन नशामुक्ति अभियान के जरिए लोगों को शराब और अन्य नशे से दूर रहने का संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ शहर के कई इलाकों में शराब दुकानों के आसपास बिल्कुल उलटी तस्वीर देखने को मिल रही है। आरोप हैं कि शराब दुकानों के बाहर, आसपास के ढाबों, खाने-पीने की दुकानों और खुले स्थानों पर लोगों को बैठाकर शराब पीने की व्यवस्था की जा रही है।
कई जगह शाम होते ही शराब दुकानों के बाहर सड़क किनारे लोगों का जमावड़ा लग जाता है। कोई दुकान के सामने खड़े होकर शराब पी रहा है तो कोई सड़क किनारे बैठकर जाम छलका रहा है। आरोप है कि कुछ स्थानों पर ढाबों और छोटे होटल संचालकों द्वारा शराब खरीदकर लाने वाले ग्राहकों को बैठने की जगह, पानी, गिलास और खाने की व्यवस्था तक उपलब्ध कराई जाती है।
शराब दुकान या खुलेआम आहता?
भोपाल के अलग-अलग इलाकों में कई शराब दुकानों के आसपास शाम के समय ऐसा माहौल दिखाई देता है, मानो दुकान के बाहर ही अनौपचारिक आहता संचालित हो रहा हो। शराब खरीदने के बाद ग्राहक दूर जाने के बजाय वहीं आसपास बैठकर शराब पीते दिखाई देते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे सबसे ज्यादा परेशानी राहगीरों, महिलाओं और आसपास रहने वाले परिवारों को होती है। कई स्थानों पर शराब पीने वालों के कारण सड़क किनारे भीड़ लगती है, गाली-गलौज और विवाद की स्थिति बनती है तथा यातायात भी प्रभावित होता है।
जिम्मेदारी किसकी—पुलिस या आबकारी विभाग?
अब सबसे अहम सवाल जिम्मेदारी का है।
क्या शराब दुकानों के लाइसेंस की शर्तों और अवैध शराब सेवन की व्यवस्था की जांच आबकारी विभाग करेगा?
या फिर सार्वजनिक स्थानों, सड़क किनारे और खुले में शराब पीने वालों के खिलाफ कार्रवाई पुलिस की जिम्मेदारी है?
असल में दोनों विभागों की भूमिका अलग-अलग होने के बावजूद ऐसी स्थिति में समन्वित कार्रवाई की जरूरत दिखाई देती है। आबकारी विभाग को शराब दुकानों और उनसे जुड़े लाइसेंस नियमों की जांच करनी चाहिए, जबकि सार्वजनिक स्थानों पर कानून-व्यवस्था और खुलेआम शराब पीने जैसी गतिविधियों पर पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
लेकिन जनता का सवाल सीधा है—जब यह सब खुलेआम दिखाई दे रहा है, तो कार्रवाई आखिर क्यों नहीं हो रही?
ढाबों पर भी परोसी जा रही शराब!
सवाल केवल शराब दुकानों के बाहर खड़े होकर शराब पीने तक सीमित नहीं है। आरोप हैं कि शहर के कई ढाबों और खाने-पीने की दुकानों पर भी शराब पीने की सुविधा दी जा रही है। ग्राहक शराब बाहर से खरीदकर लाते हैं और ढाबे पर बैठकर उसका सेवन करते हैं।
यदि किसी परिसर के पास शराब सेवन के लिए वैध लाइसेंस या अनुमति नहीं है, तो वहां इस तरह शराब पीने की व्यवस्था कराना गंभीर सवाल खड़े करता है। केवल यह कह देना कि ग्राहक अपनी शराब लेकर आया है, जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं होना चाहिए। प्रशासन को यह देखना होगा कि आखिर बिना वैध अनुमति के शराब सेवन के लिए जगह उपलब्ध कराने की व्यवस्था किस आधार पर चल रही है।
आबकारी नीति और लाइसेंस व्यवस्था पर सवाल
शराब की बिक्री और उसके सेवन के लिए राज्य की आबकारी व्यवस्था के तहत अलग-अलग नियम और लाइसेंस व्यवस्था होती है। सामान्य शराब दुकान का उद्देश्य लाइसेंस की शर्तों के अनुसार शराब की बिक्री करना है। वहीं परिसर में बैठाकर शराब पिलाने या सेवन की व्यवस्था के लिए अलग प्रकार की वैधानिक अनुमति और लाइसेंस की आवश्यकता हो सकती है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शराब दुकान के बाहर खुले में या आसपास कथित रूप से नियमित बैठने और शराब पीने की व्यवस्था चल रही है, तो उसकी जांच कौन करेगा? क्या यह किसी वैध लाइसेंस के तहत हो रहा है या फिर खुलेआम नियमों की अनदेखी की जा रही है?
सड़क किनारे शराब पीना, आम लोगों की परेशानी
राजधानी में कई स्थानों पर शराब खरीदने के बाद लोग दुकान के बाहर, फुटपाथ या सड़क किनारे खड़े होकर शराब पीते नजर आते हैं। खाली बोतलें, डिस्पोजल गिलास और शराब की पैकिंग सड़क किनारे फेंकी जाती है।
इससे न केवल शहर की व्यवस्था और स्वच्छता प्रभावित होती है, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने से कानून-व्यवस्था की चुनौती भी पैदा हो सकती है। देर रात तक चलने वाले ऐसे जमावड़ों से आसपास रहने वाले लोगों को परेशानी होने की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं।
लेकिन जनता का सवाल सीधा है—जब यह सब खुलेआम दिखाई दे रहा है, तो कार्रवाई आखिर क्यों नहीं हो रही?
नशामुक्ति अभियान और जमीनी हकीकत
यही विरोधाभास इस पूरे मुद्दे को सबसे ज्यादा गंभीर बनाता है। एक तरफ नशामुक्ति अभियान के माध्यम से युवाओं और समाज को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया जा रहा है, दूसरी तरफ शहर में कथित अवैध आहतों और खुलेआम शराब सेवन की तस्वीरें अभियान की गंभीरता पर सवाल खड़े करती हैं।

कार्टून के जरिए भी इसी विरोधाभास को सामने रखा गया है—
«“जहां मन हो वहां बैठकर पियो, वैसे भी राजधानी में नशामुक्ति अभियान चल रहा है!”»
यह व्यंग्य केवल शराब पीने वालों पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल है जो नियमों के उल्लंघन को देखकर भी कार्रवाई करने में नाकाम नजर आती है।
जांच और कार्रवाई की जरूरत
भोपाल प्रशासन, पुलिस और आबकारी विभाग को संयुक्त रूप से शहर में शराब दुकानों के आसपास की स्थिति की जांच करनी चाहिए। यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि—
- शराब दुकानों के बाहर बैठकर शराब पीने की अनुमति किन परिस्थितियों में है?
- किन ढाबों और प्रतिष्ठानों के पास शराब परोसने या सेवन कराने की वैध अनुमति है?
- बिना लाइसेंस के शराब पीने की जगह उपलब्ध कराने वालों पर क्या कार्रवाई होगी?
- सार्वजनिक सड़क और खुले स्थानों पर शराब पीने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
- शराब दुकानों के आसपास कथित अवैध आहते चल रहे हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही किसकी होगी?
राजधानी की सड़कों और शराब दुकानों के बाहर दिखाई देने वाला यह दृश्य केवल कानून के उल्लंघन का सवाल नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही का भी सवाल है। नशामुक्ति का संदेश तभी प्रभावी होगा, जब जमीन पर नियमों का पालन भी उतनी ही सख्ती से कराया जाए।

