हरदीप सिंह पुरी बीजेपी के लिए मजबूरी या राजनीतिक जरूरी? एपस्टीन विवाद के बीच MP से राज्यसभा का रास्ता कैसे खुला

एपस्टीन विवाद के बीच हरदीप सिंह पुरी ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा का नामांकन दाखिल किया. उत्तर प्रदेश से टिकट नहीं मिलने के बाद बीजेपी ने पुरी को MP से उम्मीदवार क्यों बनाया? जानिए पूरा सियासी गणित.

हरदीप सिंह पुरी बीजेपी के लिए मजबूरी या राजनीतिक जरूरी? एपस्टीन विवाद के बीच MP से राज्यसभा का रास्ता कैसे खुला

तमाम राजनीतिक झंझावातों के बीच. हरदीप सिंह पुरी ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा का नामांकन दाखिल कर दिया है. 12 नवंबर को राज्यसभा के सदस्य चुन भी लिए जाएंगे...पुरी को जब उत्तर प्रदेश से तीसरी राज्यसभा का उम्मीदवार नहीं बनाया गया. तो चर्चा चली कि एपस्टीन के साथ नाम आने पर नैतिकताओं के आधार पर उन्हें सजा मिली है. लेकिन राजनीति में नैतिकताओं और किंतु-परंतु की कोई जगह नहीं होती. यहां सियासी समीकरण और फायदे हावी रहते हैं. भारत की राजनीति में तो फिलहाल यही लग रहा है. क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता. तो जेफ्री एपस्टीन से संपर्कों के खुलासे के बाद फ्रांस के पूर्व संस्कृति मंत्री जैक लैंग. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के चीफ ऑफ स्टाफ मॉर्गन मैकस्वीनी और कम्युनिकेशंस डायरेक्टर टिम एलन को अपने पद क्यों छोड़ने पड़ते? फिर हरदीप सिंह पुरी के मामले में ऐसी ही कोई राजनीतिक जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए थी? चर्चाएं तो यहां तक थीं कि पुरी को मंत्री पद से भी इस्तीफा देना पड़ सकता है. लेकिन अब उनके लिए मध्य प्रदेश से राज्यसभा का रास्ता खुल गया है. आखिर एपस्टीन विवाद के बावजूद पुरी की सियासी पारी कैसे आगे बढ़ रही है? क्या हरदीप सिंह पुरी बीजेपी के लिए मजबूरी हैं या राजनीतिक जरूरी. 

उत्तर प्रदेश से टिकट क्यों नहीं मिला?

तो सबसे पहले बात करते हैं उस सियासी गणित की, जिसकी वजह से हरदीप सिंह पुरी को उत्तर प्रदेश से टिकट नहीं मिलने के बाद मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजने का रास्ता तैयार किया गया. बीजेपी ने 5 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश की आठ राज्यसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों का ऐलान किया. आठ नाम आए. लेकिन उनमें हरदीप सिंह पुरी नहीं थे. जबकि पुरी केंद्र सरकार में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

अब सवाल था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ.? इसके पीछे एक वजह उत्तर प्रदेश का जातीय समीकरण बताया गया. 2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. बीजेपी ने राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन में पिछड़े वर्ग. ब्राह्मण, दलित और ठाकुर चेहरों को जगह दी. यानी यूपी में चुनावी जमीन मजबूत करने के लिए पार्टी ने अपने पुराने समीकरणों के हिसाब से उम्मीदवार चुने.

पंजाब चुनाव और बीजेपी के लिए पुरी की अहमियत

लेकिन पुरी को लेकर कहानी सिर्फ इतनी नहीं है. हरदीप सिंह पुरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में इकलौते सिख मंत्री हैं. और 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में पुरी को सरकार में बनाए रखना बीजेपी के लिए पंजाब के सियासी समीकरणों के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है. द ट्रिब्यून और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती हैं. इसके अलावा बीजेपी कांग्रेस को कोई राजनीतिक हथियार भी नहीं देना चाहती. क्योंकि अगर पुरी को राज्यसभा का उम्मीदवार नहीं बनाया जाता. तो कांग्रेस इसे एपस्टीन विवाद से जोड़कर मोदी सरकार पर हमलावर हो सकती थी. यह नैरेटिव बना सकती थी कि एपस्टीन के साथ नाम जुड़ने के दबाव में मोदी सरकार ने अपने ही मंत्री को किनारे कर दिया. लिहाजा पुरी को मध्य प्रदेश से उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने ऐसी किसी राजनीतिक कहानी को खड़ा होने से रोकने की कोशिश हो सकती है.

क्या है पुरी और जेफ्री एपस्टीन का विवाद?

अब जरा उस विवाद पर लौटते हैं. जिसने पुरी की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ाई थीं. जेफ्री एपस्टीन. अमेरिका का वह अमीर कारोबारी. जिसके खिलाफ नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और सेक्स ट्रैफिकिंग के गंभीर मामले सामने आए. 2019 में जेल में उसकी मौत हो गई. लेकिन उसकी मौत के बाद भी उसके संपर्कों और ईमेल्स की फाइलें दुनिया के ताकतवर लोगों के लिए मुसीबत बनती रहीं. 30 जनवरी 2026 को अमेरिकी न्याय विभाग ने एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक किया. इन्हीं दस्तावेजों में हरदीप सिंह पुरी के ईमेल सामने आए. और ये कोई ऐसा मामला नहीं था कि पुरी ने एपस्टीन को जानने से ही इनकार कर दिया हो. पुरी ने खुद स्वीकार किया कि उनकी एपस्टीन से तीन या चार बार मुलाकात हुई थी. लेकिन उन्होंने हर बार यही कहा कि मुलाकातें पेशेवर थीं. वे उस समय इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट से जुड़े काम कर रहे थे. और उनका एपस्टीन से संपर्क लिंक्डइन के सह-संस्थापक रीड हॉफमैन के भारत दौरे और इंटरनेट कारोबार की संभावनाओं को लेकर था.

एपस्टीन को लिखे ईमेल में क्या था?

अब सबसे बड़ा सवाल उन ईमेल्स पर. दिसंबर 2014 में पुरी ने एपस्टीन को लिखा कि जब वह अपने Exotic Island से लौटें तो उनसे संपर्क करें. इसके बाद उन्होंने Have Fun भी लिखा. अब भला कोई पूछेगा नहीं कि आखिर एपस्टीन के साथ इस तरह की बातचीत क्यों हो रही थी? पुरी ने NDTV को दिए इंटरव्यू में कहा कि Exotic Island सामान्य बातचीत में इस्तेमाल किया गया शब्द था. उन्होंने यह भी कहा कि वह कभी एपस्टीन के निजी द्वीप पर नहीं गए और एपस्टीन कभी उनके घर नहीं आया.

राहुल गांधी ने भी संसद में उठाया था मामला

राहुल गांधी ने संसद में भी इस मामले को उठाया. उन्होंने अनिल अंबानी और एपस्टीन के बीच संपर्क को लेकर पुरी से सवाल किए. लेकिन पुरी ने उनके आरोपों को बेबुनियाद बताया. अब यहां एक बात समझना जरूरी है... एपस्टीन के दस्तावेजों में नाम आना. उससे ईमेल होना या मुलाकात करना और उसके अपराधों में शामिल होना. ये तीनों अलग-अलग बातें हैं. पुरी के खिलाफ सामने आए ईमेल अपने आप में किसी आपराध में शामिल होने का प्रमाण नहीं देते. लेकिन सार्वजनिक जीवन में सवाल तो उठेंगे. और जवाब भी मांगे जाएंगे.