अपनी ही सरकार में धरने पर बैठे पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी
मध्यप्रदेश के रतलाम में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी अपनी ही सरकार की पुलिस व्यवस्था के खिलाफ धरने पर बैठ गए। मामला मीसाबंदी बसंत पुरोहित की जमीन पर कथित कब्जे से जुड़ा है, जिसमें शिकायत के बावजूद पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही थी।
मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली को लेकर वैसे तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार शिवराज सिंह चौहान से लेकर डॉ. मोहन यादव सरकार तक को कटघरे में खड़ा करता आया है। लेकिन इस बार जो तस्वीर सामने आई है, उसने सीधे तौर पर सत्ता पक्ष और ब्यूरोक्रेसी के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। जब सूबे के पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के बेहद कद्दावर व वरिष्ठ नेता हिम्मत कोठारी को न्याय के लिए रतलाम एसपी ऑफिस के फर्श पर बैठकर धरना देना पड़े, तो मामला सिर्फ एक स्थानीय विवाद तक सीमित नहीं रह जाता।
यह घटना सीधे तौर पर मध्य प्रदेश के गृह विभाग, पुलिस प्रशासन और 'सिस्टम' की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा करती है। राजनीतिक गलियारों और आम जनता के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है- "जब प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री की बात थाने का एक टीआई (थाना प्रभारी) नहीं सुन रहा, तो सूबे की आम जनता की सुनवाई किस स्तर पर होती होगी.
अपनी ही सरकार में बेबस दिखे पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी..
बुधवार का दिन रतलाम और मध्य प्रदेश की सियासत में एक अप्रत्याशित हलचल लेकर आया। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हिम्मत कोठारी अचानक रतलाम पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय पहुंचे। किसी को अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने वाला है। उन्होंने बिना किसी तामझाम के, सीधे एसपी ऑफिस के गलियारे में जमीन पर बैठकर धरना शुरू कर दिया।

पूर्व गृहमंत्री के जमीन पर बैठते ही पूरे पुलिस महकमे और प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में एसपी अमित कुमार खुद अपने कक्ष से बाहर दौड़ते हुए आए। उन्होंने कोठारी को मनाने की कोशिश की और उन्हें सम्मानपूर्वक अपने केबिन के अंदर ले जाकर लंबी चर्चा की। एक वरिष्ठ भाजपा नेता का इस तरह बेबस होकर अपनी ही सरकार की पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोलना, प्रशासनिक शिथिलता की जीती-जागती मिसाल बन गया।
क्या है पूरा विवाद? मीसाबंदी के प्लॉट पर कब्जे का मामला..
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक जमीन विवाद और पुलिस की कथित लापरवाही है। जानकारी के अनुसार, आपातकाल के दौरान मीसाबंदी रहे बसंत पुरोहित की एक मूल्यवान प्रॉपर्टी पर कुछ रसूखदारों द्वारा जबरन कब्जा करने की शिकायत सामने आई थी। पीड़ित पक्ष लंबे समय से न्याय के लिए भटक रहा था।
इस मामले में रतलाम के दीनदयाल नगर (DDN) थाना पुलिस को कार्रवाई करनी थी। पीड़ित परिवार की मदद के लिए पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी ने खुद हस्तक्षेप किया था। आरोप है कि लिखित शिकायत और पर्याप्त साक्ष्य होने के बावजूद पुलिस महीनों तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और आरोपियों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा। इसी हीलाहवाली और देरी से नाराज होकर कोठारी को आखिरकार यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।
नेता की नहीं सुन रहे, तो जनता का क्या होगा..
धरने के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए हिम्मत कोठारी का दर्द और आक्रोश साफ झलका। उनकी नाराजगी सिर्फ इस एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने सीधे तौर पर प्रदेश की पुलिसिंग और व्यवस्था पर प्रहार किया। पूर्व गृहमंत्री ने बताया:मैंने इस पूरे मामले से काफी समय पहले ही एसपी को व्यक्तिगत रूप से अवगत करा दिया था। एसपी ने मेरे सामने ही थाना प्रभारी (TI) को तुरंत जांच कर सख्त कार्रवाई के निर्देश भी दिए थे। लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी टीआई ने एक कदम तक नहीं उठाया। जब एसपी के आदेश को एक थाना प्रभारी ठेंगे पर रख रहा है, तो समझा जा सकता है कि नीचे के स्तर पर क्या चल रहा है। मुझे मजबूरन इस उम्र में धरने पर बैठना पड़ा।

एसपी की एंट्री और भारी दबाव के बाद दर्ज हुई एफआईआर..
पूर्व गृहमंत्री के धरने पर बैठने और मीडिया में खबर फैलने के बाद रतलाम पुलिस बैकफुट पर आ गई। प्रशासनिक दबाव इस कदर बढ़ा कि आनन-फानन में फाइलों को आगे बढ़ाया गया। रतलाम एसपी अमित कुमार ने मीडिया से चर्चा में स्वीकार किया कि इस मामले में नीचे के स्तर पर लापरवाही हुई है। एसपी ने बताया कि उन्होंने दीनदयाल नगर थाना प्रभारी को कड़ी फटकार लगाई है। इसके साथ ही, मीसाबंदी की जमीन पर अवैध कब्जा करने वाले आरोपियों के खिलाफ तत्काल विभिन्न धाराओं में एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली गई है। एसपी अमित कुमार ने यह भी साफ किया कि कर्तव्य में लापरवाही बरतने और कार्रवाई में जानबूझकर देरी करने को लेकर संबंधित थाना प्रभारी को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी किया गया है, और उनका जवाब आने के बाद आगे की विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
आर-पार के मूड में कोठारी: जरूरत पड़ी तो छोड़ दूंगा पार्टी..
हिम्मत कोठारी का गुस्सा सिर्फ पुलिस तक ही सीमित नहीं रहा, उन्होंने अपनी ही सरकार के वर्तमान जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने नसीहत देते हुए कहा कि सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों की यह पहली जिम्मेदारी है कि वे देखें कि थानों और दफ्तरों में आम जनता की सुनवाई हो रही है या नहीं। यदि अधिकारी अपनी मर्जी से चलेंगे और जनप्रतिनिधि मौन रहेंगे, तो पूरे प्रदेश में अराजकता और जंगलराज फैल जाएगा।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कोठारी ने एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा बयान दे डाला। उन्होंने कहा: वे इस लड़ाई को बीच में नहीं छोड़ेंगे। अगर पीड़ित परिवार को पूर्ण न्याय नहीं मिला, तो वे संगठन और पार्टी आलाकमान से अनुमति लेकर आमरण अनशन पर बैठेंगे। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, अगर मुझे अपनी ही पार्टी की सरकार में जनता की लड़ाई लड़ने के लिए अनुमति नहीं मिली, तो मैं जनता के हक के लिए पार्टी छोड़ने जैसा कड़ा फैसला लेने से भी पीछे नहीं हटूंगा।"
भाजपा सरकार के लिए बढ़ी राजनीतिक असहजता..
रतलाम का यह पूरा घटनाक्रम डॉ. मोहन यादव सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक असहजता पैदा करने वाला है। एक तरफ मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के रूप में डॉ. यादव लगातार पुलिसिंग को सख्त करने, थानों में जनसुनवाई बेहतर करने और अपराधियों पर नकेल कसने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, उनकी ही पार्टी के एक ऐसे नेता का सड़क पर आना, जो खुद प्रदेश का गृह विभाग संभाल चुके हैं, सरकार के दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है।

