दहेज की आग में हर दिन बुझती ज़िंदगियां, आखिर कब बदलेगा समाज?

NCRB रिपोर्ट के अनुसार भारतीय शहरों में अपराध के मामलों में दिल्ली सबसे ऊपर है. जारी आंकड़ों में कानपुर, पटना और बेंगलुरु जैसे शहर भी सूची में शामिल हैं. जानिए शहरवार अपराध के ताजा आंकड़े और पूरी रिपोर्ट.

दहेज की आग में हर दिन बुझती ज़िंदगियां, आखिर कब बदलेगा समाज?

शादी किसी एक इंसान के कंधों पर टिकी जिम्मेदारी नहीं होती. यह दो लोगों की साझेदारी है, जिसमें रिश्ते को निभाने और बचाने की जिम्मेदारी भी दोनों की बराबर होती है. लेकिन हमारे समाज में अक्सर शादी बचाने का पूरा बोझ लड़कियों पर डाल दिया जाता है. उन्हें हर हाल में समझौता करने, सहने और चुप रहने की सलाह दी जाती है. यही चुप्पी कई बार उनकी जान तक ले लेती है.

बीते कुछ दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी कई खबरें सामने आईं, जिन्होंने समाज को झकझोर दिया. नोएडा की दीपिका, भोपाल की ट्विशा, कर्नाटक की ऐश्वर्या, दिल्ली की वीणा कुमारी और ग्वालियर की पलक अब इस दुनिया में नहीं हैं. इन सभी की जिंदगी की शुरुआत शादी के कुछ महीनों बाद ही खत्म हो गई। हर मामले में ससुराल पक्ष पर दहेज और प्रताड़ना के आरोप लगे.

यह बहस लंबी हो सकती है कि इनकी मौत हत्या थी या आत्महत्या, लेकिन सबसे बड़ा सच यही है कि ये लड़कियां अब जीवित नहीं हैं. और इस त्रासदी की जड़ में कहीं न कहीं वह सामाजिक व्यवस्था मौजूद है, जिसमें लड़की और लड़के को बराबर नहीं माना जाता.

हर दिन 16 लड़कियों की दहेज के कारण मौत

दहेज हत्या कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं रह गई है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में दहेज मौत के 5,737 मामले दर्ज किए गए. यानी देश में औसतन हर दिन करीब 16 लड़कियों की जान दहेज की वजह से चली गई.

सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल से सामने आए. वहीं पति और ससुराल पक्ष की क्रूरता से जुड़े मामलों की संख्या एक लाख 20 हजार से ज्यादा दर्ज हुई. इसका मतलब है कि हर दिन सैकड़ों महिलाएं घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना झेल रही हैं.

शादी में बराबरी क्यों नहीं?

हमारे समाज में शादी को अक्सर दो बराबर लोगों का रिश्ता नहीं माना जाता. एक तरफ “लड़के वाले” होते हैं और दूसरी तरफ “लड़की वाले”. यही सोच रिश्ते की शुरुआत से ही असमानता पैदा कर देती है. दहेज उसी असमानता को ढंकने की कोशिश बन जाता है, लेकिन असल में यह गैरबराबरी और गहरी हो जाती है.

जब रिश्ते बराबरी के नहीं होते, तब ताने, दबाव, मानसिक हिंसा और कई बार शारीरिक प्रताड़ना शुरू हो जाती है. दुख की बात यह है कि इन चीजों को सामान्य मान लिया गया है. बेटियों को बचपन से ही “समझौता” करना सिखाया जाता है, जबकि लड़कों को “हक” जताना.

महिलाएं हिंसा सहती क्यों हैं?

अक्सर सवाल पूछा जाता है कि लड़कियां ऐसे रिश्तों से बाहर क्यों नहीं निकलतीं. इसका जवाब आसान नहीं है. समाज लड़कियों को बचपन से यह सिखाता है कि शादी ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य है. ऐसे में जब शादी में हिंसा होती है, तब भी उन्हें रिश्ते को बचाने की सलाह दी जाती है.

यह सिर्फ गांवों या कम पढ़ी-लिखी महिलाओं की कहानी नहीं है. बड़े शहरों और पढ़े-लिखे परिवारों की महिलाएं भी मानसिक और शारीरिक हिंसा झेलती रहती हैं. क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर शादी टूट गई, तो समाज उन्हें ही दोष देगा.

कानून से ज्यादा सोच बदलने की जरूरत

दहेज के खिलाफ कानून लंबे समय से मौजूद हैं, लेकिन सिर्फ कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं हुई. असली जरूरत समाज की सोच बदलने की है. जब तक लड़की को लड़के से कमतर माना जाएगा, तब तक दहेज और हिंसा खत्म नहीं होगी.

परिवारों को यह समझना होगा कि बेटी कोई बोझ नहीं है. उसकी जिंदगी की कीमत किसी रिश्ते से कम नहीं हो सकती. अगर कोई लड़की हिंसा की शिकायत करे, तो उसे चुप रहने की सलाह देने के बजाय उसका साथ देना जरूरी है.

शादी से पहले जिंदगी जरूरी

हमें यह तय करना होगा कि ज्यादा जरूरी क्या है शादी बचाना या बेटी की जिंदगी? हिंसा से भरे रिश्ते को किसी भी कीमत पर बचाने की कोशिश कई बार एक लड़की की जिंदगी छीन लेती है. लड़कियों को भी यह समझना होगा कि हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना घर तोड़ना नहीं है. जरूरत पड़े तो ऐसे माहौल से बाहर निकलना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है. दहेज की मांग, ताने, अपमान और डर ये सब हिंसा के ही रूप हैं.

समाज को अब यह स्वीकार करना होगा कि रिश्तों से पहले इंसान की जिंदगी और सम्मान मायने रखते हैं. क्योंकि किसी भी लड़की की जिंदगी किसी शादी से छोटी नहीं हो सकती.