‘इक्का’ मूवी रिव्यू: सनी देओल और अक्षय खन्ना की टक्कर, कोर्टरूम में किसने मारी बाजी?
Ikka Movie Review: सनी देओल और अक्षय खन्ना की फिल्म ‘इक्का’ एक सस्पेंस से भरपूर कोर्टरूम ड्रामा है। जानिए फिल्म की कहानी, एक्टिंग और रेटिंग।
कोर्टरूम ड्रामा पसंद करने वाले दर्शकों के लिए ‘इक्का’ एक दिलचस्प फिल्म साबित हो सकती है। सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे दो दमदार कलाकार जब आमने-सामने हों, तो उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं। फिल्म एक मर्डर केस, एक संदिग्ध आरोपी और अपने सिद्धांतों पर चलने वाले वकील की कहानी के जरिए दर्शकों को आखिर तक उलझाए रखने की कोशिश करती है।
फिल्म की कहानी अक्षय खन्ना के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिस पर हत्या का आरोप लगा है। वहीं, सनी देओल एक ऐसे वकील की भूमिका में हैं, जो आमतौर पर उन्हीं लोगों का केस लड़ता है जिनकी बेगुनाही पर उसे भरोसा हो। उसका मकसद हमेशा निर्दोष लोगों को न्याय दिलाना रहा है और यही उसके पेशे की सबसे बड़ी पहचान भी है।
लेकिन इस बार हालात अलग हैं। परिस्थितियां उसे एक ऐसा केस लड़ने के लिए मजबूर कर देती हैं, जो उसके अपने सिद्धांतों और नैतिकता के खिलाफ दिखाई देता है। यहीं से फिल्म का असली संघर्ष शुरू होता है। सवाल सिर्फ यह नहीं रहता कि आरोपी दोषी है या निर्दोष, बल्कि यह भी कि एक वकील अपने पेशे, नैतिकता और सच के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।
करीब सवा दो घंटे की यह फिल्म अपनी कहानी से दर्शकों को बांधे रखने में काफी हद तक सफल रहती है। सबसे बड़ा सस्पेंस यही बना रहता है कि जिस हत्या को लेकर पूरी कानूनी लड़ाई चल रही है, उसकी असली सच्चाई आखिर क्या है।
अक्षय खन्ना की रहस्यमयी एक्टिंग
अक्षय खन्ना की सबसे बड़ी ताकत उनका ऐसा अभिनय है, जिसमें उनके किरदार को आसानी से पढ़ पाना मुश्किल हो जाता है। कई मौकों पर दर्शक खुद तय नहीं कर पाते कि उनका किरदार वास्तव में बेगुनाह है या फिर किसी बड़े राज को छिपा रहा है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म के सस्पेंस को मजबूत बनाती है।
हालांकि, फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभाव सनी देओल छोड़ते हैं। एक ऐसे वकील के रूप में, जिसने अपने करियर में कोई केस नहीं हारा, उनका किरदार काफी दिलचस्प तरीके से लिखा गया है। खासकर तब, जब उन्हें अपने ही एथिक्स के खिलाफ जाकर एक केस लड़ना पड़ता है।
सनी देओल का किरदार परिस्थितियों से समझौता जरूर करता दिखाई देता है, लेकिन भ्रष्ट हुए बिना जिस तरह वह कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाता है, वही फिल्म का मजबूत पक्ष बन जाता है।
क्लाइमैक्स में खुलता है असली ‘इक्का’
फिल्म का क्लाइमैक्स इसकी बड़ी ताकत है। जैसे-जैसे कहानी अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचती है, कई सवालों के जवाब सामने आने लगते हैं। आखिरी हिस्से में सनी देओल के किरदार की चाल के साथ यह भी साफ होता है कि फिल्म का नाम ‘इक्का’ क्यों रखा गया है।
हालांकि, फिल्म पूरी तरह चौंकाने वाली नहीं है। कई जगह कहानी का अगला मोड़ पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा सनी देओल के किरदार को केस लड़ने के लिए जिस मजबूरी से जोड़ा गया है, वह हर दर्शक को आसानी से स्वीकार हो, यह जरूरी नहीं। संभव है कि फिल्म का यही हिस्सा कुछ दर्शकों के बीच बहस या ट्रोलिंग की वजह भी बने।
बिना गानों के सीधे कहानी पर फोकस
फिल्म की अच्छी बात यह है कि इसमें गैरजरूरी गानों के जरिए कहानी की रफ्तार को नहीं रोका गया है। फिल्म सीधे अपने मुख्य प्लॉट पर टिकी रहती है और ज्यादातर समय बोर नहीं करती। कोर्टरूम ड्रामा और सस्पेंस पसंद करने वाले दर्शकों के लिए यह एक अच्छी वन-टाइम वॉच बन सकती है।
फिल्म में अत्यधिक अश्लीलता, गाली-गलौज या अनावश्यक ब्रूटैलिटी नहीं है, इसलिए इसे परिवार के साथ भी देखा जा सकता है।
सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे दो शानदार कलाकारों को देखते हुए फिल्म से बहुत ज्यादा उम्मीदें होना स्वाभाविक है। फिल्म उन उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती, लेकिन एक मनोरंजक कोर्टरूम ड्रामा के तौर पर निराश भी नहीं करती। ओटीटी रिलीज के लिहाज से यह एक ठीक फैसला नजर आता है, क्योंकि इसकी कहानी बड़े पर्दे के तमाशे से ज्यादा कंटेंट और परफॉर्मेंस पर निर्भर है।
रेटिंग: 3.5/5 स्टार
अगर आपको कोर्टरूम ड्रामा, मर्डर मिस्ट्री और सस्पेंस से भरी फिल्में पसंद हैं, तो ‘इक्का’ को एक बार अपनी वॉचलिस्ट में जरूर शामिल किया जा सकता है। हालांकि, यह ऐसी फिल्म शायद नहीं है जिसे खत्म करने के बाद तुरंत दोबारा देखने का मन करे।
Anubhav Dubey 
