प्रकृति और इतिहास का संगम बारिश से निखरा बहुती वॉटरफाल

प्रकृति और इतिहास का संगम बारिश से निखरा बहुती वॉटरफाल, प्रशासन ने जारी की सुरक्षा गाइडलाइन ओड्डा नदी का बढ़ा जल प्रवाह, बहुती जलप्रपात बना आकर्षण का केंद्र मानसून से सवर गया बहुती, 650 फीट से गिर रही सफेद जलधारा, पर्यटकों का बढ़ा रुझान

प्रकृति और इतिहास का संगम बारिश से  निखरा बहुती वॉटरफाल

राजेंद्र पयासी मऊगंज: जुलाई माह के पहले सप्ताह में हुई मानसूनी बारिश ने मऊगंज जिले के बहुती जलप्रपात को फिर से संजीवनी दे दी है। ओड्डा नदी में जल प्रवाह बढ़ने के बाद करीब 650 फीट यानी 198 मीटर की ऊंचाई से गिरती सफेद जलधारा ने पूरे क्षेत्र को अपने आगोश में ले लिया है। झरने से गिरते पानी की गर्जना, जलप्रपात के नीचे चारों ओर फैली घनी हरियाली और हवा में उड़ती ठंडी फुहारों ने यहां पहुंचे हर पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।  पिछले दो दिनों में पानी का बहाव बढ़ गया है कि झरने के नीचे बना कुंड पूरी तरह भर गया है। जब पानी ऊंची चट्टान से टकराकर नीचे गिरता है तो उसकी बूंदें कई सौ मीटर दूर तक महसूस की जा रही हैं। स्थानीय गाइडों के अनुसार इस बार मानसून की शुरुआत में जलप्रवाह सामान्य है, फिर भी पर्यटकों की संख्या वृद्धि हुई  है। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सुबह से शाम तक बड़ी संख्या में लोग यहां प्रकृति का आनंद लेने पहुंच रहे हैं।  

मध्य प्रदेश का सबसे ऊंचा जलप्रपात होने के कारण बहुती की पहचान पूरे प्रदेश में है। यह ओड्डा नदी पर स्थित है। जलप्रपात के नीचे यह नदी नैना नाम से तो आगे चलकर यह  तमस नदी में मिल जाती है। जुलाई से फरवरी मार्च तक का समय यहां का सबसे अच्छा समय माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान झरना अपने पूरे शबाब और सौंदर्य के साथ बहता है।  

प्रकृति और इतिहास का अद्भुत संगम है बहुती क्षेत्र  

बहुती केवल एक जलप्रपात नहीं, बल्कि प्रकृति और इतिहास का संगम है। यहां पहुंचने के लिए जलप्रपात के सौंदर्य को देखने के लिए उत्तम व्यवस्था है लेकिन जलप्रपात के नीचे उतरने के लिए जंगल और पहाड़ियों से होकर गुजरना पड़ता है, जो ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए किसी रोमांच से कम नहीं है। फोटोग्राफरों के लिए भी यह जगह किसी जन्नत से कम नहीं लगती। मानसून में चारों तरफ हरियाली, झरने की सफेद धारा और नीले बादलों का नजारा कैमरे में कैद करने लायक होता है।  इस क्षेत्र की एक और बड़ी खासियत यहां मिले 11वीं और 12वीं शताब्दी के शैल चित्र हैं। जलप्रपात के आसपास की गुफाओं और चट्टानों पर बने इन चित्रों में उस समय के जीवन, शिकार और धार्मिक मान्यताओं को दर्शाया गया है। पुरातत्व विभाग के अनुसार ये चित्र इस क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को समझने में मदद करते हैं। इसी कारण इतिहासकार और शोधार्थी भी यहां पहुंचते हैं।  परिवहन की दृष्टि से भी बहुती काफी सुविधाजनक है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 135 से सीधे जुड़ा हुआ है। रीवा सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा है। प्रयागराज का बमरौली एयरपोर्ट भी यहां से कुछ घंटों की दूरी पर है। सड़क मार्ग से आने वाले पर्यटकों के लिए रीवा से मऊगंज होते हुए सीधा रास्ता है। 

सुरक्षा को लेकर प्रशासन सख्त, पर्यटकों से की गई अपील 

पर्यटकों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस पूरी तरह सतर्क हो गई है। मऊगंज के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शशिकांत सरयाम ने सभी पर्यटकों से अपील की है कि वे झरने के अत्यधिक निकट न जाएं और पहाड़ी के किनारे से नीचे झांकने का प्रयास न करें। उन्होंने कहा कि बरसात के दिनों में चट्टानों पर काई और फिसलन बढ़ जाती है, जिससे गिरकर गंभीर चोट लगने का खतरा बना रहता है। प्रशासन ने झरने के आसपास चेतावनी बोर्ड लगवाए हैं और बैरिकेडिंग भी की गई है। पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम लगातार गश्त कर रही है। पर्यटकों को सलाह दी गई है कि वे सुरक्षित तरीके से ट्रेकिंग करें और बच्चों का विशेष ध्यान रखें।  

स्थानीय जनप्रतिनिधियों का मानना है कि यदि बहुती में पेयजल, शौचालय, गाइड और प्राथमिक उपचार जैसी बुनियादी सुविधाएं और बेहतर की जाएं, तो यह स्थान मध्य प्रदेश के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में शुमार हो सकता है। इससे न केवल जिले को राजस्व मिलेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त होंगे।  फिलहाल बहुती जलप्रपात अपनी अनुपम छटा बिखेर रहा है। सफेद जलधारा, प्रपात के नीचे घने जंगल और मानसूनी माहौल मिलकर इसे इस सीजन का सबसे आकर्षक पर्यटन स्थल बना रहे हैं