जंगलों की रक्षा करने वाले संवेदनशील प्रहरी मृदुल कुमार पाठक नहीं रहे
वनों और वन्यजीवों के की रक्षा कर संवेदनशील प्रहरी मृदुल कुमार पाठक का निधन, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में संरक्षण की अमिट विरासत छोड़ गए IFS अधिकारी
मध्य प्रदेश। भोपाल। मध्यप्रदेश वन विभाग के वरिष्ठ व भारतीय वन सेवा अधिकारी मृदुल कुमार पाठक के निधन से वन विभाग और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में गहरी रिक्तता उत्पन्न हो गई है। जंगलों, वन्यजीवों और प्रकृति के संरक्षण के लिए अपना पूरा सेवाकाल समर्पित करने वाले मृदुल कुमार पाठक अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके निधन से मध्यप्रदेश वन विभाग और विशेष रूप से बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व परिवार ने एक अभिभावक, कुशल संरक्षणविद् और सच्चे प्रकृति-प्रेमी को खो दिया है।
बांधवगढ़ से था गहरा जुड़ाव
मृदुल कुमार पाठक का बांधवगढ़ से रिश्ता केवल एक अधिकारी और पदस्थापना तक सीमित नहीं था, बल्कि यह जंगल और वन्यजीवों के प्रति उनके गहरे लगाव की कहानी थी। उन्होंने बांधवगढ़ में दो महत्वपूर्ण कार्यकालों के दौरान अपनी सेवाएं दीं और वन्यजीव संरक्षण के लिए उल्लेखनीय कार्य किए।
उप संचालक के रूप में मजबूत की वन्यजीव प्रबंधन व्यवस्था
सितंबर 2010 से अक्टूबर 2012 तक उप संचालक के रूप में उन्होंने बांधवगढ़ के वन्यजीव प्रबंधन को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। गश्ती व्यवस्था को सुदृढ़ करना, अवैध शिकार पर प्रभावी नियंत्रण और पर्यटन के बेहतर नियमन जैसे विषय उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहे।

क्षेत्र संचालक के कार्यकाल में संरक्षण पर जोर
नवंबर 2016 से मार्च 2019 तक क्षेत्र संचालक के रूप में उनका कार्यकाल बांधवगढ़ के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान बाघों की सुरक्षा के लिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और ग्रामीणों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया गया।
संकट की परिस्थितियों में त्वरित राहत पहुंचाने और मैदानी अमले को मजबूत करने की उनकी कार्यशैली ने विभागीय टीम में भरोसा पैदा किया। वे कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले वनकर्मियों का मनोबल बढ़ाने में विश्वास रखते थे।
वनकर्मियों के बीच अलग पहचान
मृदुल कुमार पाठक की पहचान केवल एक कुशल प्रशासक के रूप में नहीं थी। मैदानी कर्मचारियों के प्रति उनका अपनापन और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता उन्हें सहयोगियों के बीच अलग पहचान दिलाती थी। वे संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व मानते थे।

संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन पर दिया जोर
बांधवगढ़ में पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में भी उनके प्रयास उल्लेखनीय रहे। उन्होंने स्थानीय समुदायों को संरक्षण और पर्यटन गतिविधियों से जोड़ने सहित जंगल और उसके आसपास रहने वाले लोगों के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने पर विशेष ध्यान दिया।
सेवानिवृत्ति के बाद भी जंगलों से जुड़ाव रहा कायम
सेवानिवृत्ति के बाद भी जंगल उनसे दूर नहीं हुए। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विषयों में उनकी रुचि और सक्रियता बनी रही। उनका जीवन इस बात की मिसाल रहा कि किसी वन अधिकारी की पहचान केवल उसके पद या वर्दी से नहीं, बल्कि जंगल और वन्यजीवों के प्रति उसकी संवेदना और समर्पण से बनती है।
पीछे छोड़ गए समर्पण की विरासत
मृदुल कुमार पाठक के निधन का दुख इसलिए भी गहरा है कि उन्होंने पीछे केवल सरकारी सेवा का रिकॉर्ड नहीं छोड़ा, बल्कि सहकर्मियों की यादें, वनकर्मियों का स्नेह और जंगलों के प्रति समर्पण की एक विरासत छोड़ी है। बांधवगढ़ के जंगलों में गूंजती बाघों की दहाड़, पगडंडियों पर चलती गश्ती टीम और उन जंगलों की रक्षा में जुटे वनकर्मियों की स्मृतियों में उनका नाम हमेशा जीवित रहेगा।

