सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश: हाईकोर्ट 3 महीने से ज्यादा सुरक्षित न रखें फैसला; जमानत पर आदेश उसी दिन या अगले दिन दें
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया है कि रिजर्व फैसले 3 महीने के भीतर सुनाए जाएं। बेल मामलों में आदेश उसी दिन या अगले दिन देने को कहा गया है।
नई दिल्ली: देश की अदालतों में मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने और फैसलों में होने वाली देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सभी हाईकोर्ट्स (High Courts) के लिए नए और कड़े निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी भी मामले में बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित (Reserve) रखने की अवधि 3 महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए।
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विपुल एम. पंचोली और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने यह ऐतिहासिक निर्देश जारी करते हुए कहा कि न्याय प्रक्रिया में ऐसी देरी को अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 5 बड़ी गाइडलाइंस..
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और निचली अदालतों के लिए निम्नलिखित नियम तय किए हैं:
- 3 महीने की समय सीमा: किसी भी मामले का फैसला रिजर्व रखने के बाद उसे अधिकतम 3 महीने के भीतर सुनाना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो रजिस्ट्रार जनरल इस मामले को संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने पेश करेंगे।
- जमानत (Bail) पर तुरंत फैसला: जमानत से जुड़े मामलों पर आदेश या तो उसी दिन सुनाया जाए या फिर अधिकतम अगले दिन हर हाल में सुना दिया जाए।
- वेबसाइट पर फ्लैश होगी तारीख: मामलों पर बहस और दलीलें खत्म होने के बाद फैसला किस तारीख को सुरक्षित रखा गया है, इसे सभी हाईकोर्ट अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर फ्लैश करेंगे।
- खुली अदालत में घोषणा: फैसले का वह हिस्सा जिस पर तुरंत एक्शन लिया जाना है, उसे खुली अदालत में पढ़कर सुनाया जाए। बाकी का विस्तृत आदेश 7 दिनों के भीतर ऑनलाइन अपलोड किया जाए।
- बेंच बदलने का अधिकार: यदि फैसले का मुख्य हिस्सा 15 दिनों में अपलोड नहीं होता है, तो इसके लिए आवेदन किया जा सकता है। अगर 30 दिनों के भीतर भी कारण अपलोड नहीं किए जाते हैं, तो याचिकाकर्ता मामले को वापस लेने और उसे किसी दूसरी बेंच में भेजने के लिए आवेदन कर सकता है।
15 साल हाईकोर्ट जज रहा, कभी फैसला रिजर्व नहीं रखा - CJI..
सुनवाई के दौरान बेंच की अगुवाई कर रहे जस्टिस सूर्यकांत ने अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए एक बड़ी बात कही। उन्होंने कहा- हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल में मैंने कभी भी किसी मामले में फैसला सुरक्षित नहीं रखा, और न ही ऐसा हुआ कि तीन महीने के भीतर फैसला न सुनाया गया हो। न्याय की कीमत पर ऐसी देरी को जारी रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती। यह मामला तब सामने आया जब झारखंड सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि हाईकोर्ट ने काफी समय बीत जाने के बाद भी अपना फैसला अपलोड नहीं किया था।
संविधान की धारा 142 (Article 142) का इस्तेमाल..
सुप्रीम कोर्ट ने इन कड़े निर्देशों को जारी करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी विशेष शक्तियों (Special Powers) का इस्तेमाल किया है. क्या है धारा 142? यह धारा सुप्रीम कोर्ट को 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश जारी करने की शक्ति देती है। जब किसी मामले में सामान्य कानून तुरंत या पूरा न्याय देने में असमर्थ हो, तब देश की शीर्ष अदालत इस अधिकार का उपयोग करती है।
देश की अदालतों में लंबित मामलों का डरावना आंकड़ा..
फैसलों में देरी का यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश की अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ है- सुप्रीम कोर्ट में पेंडेंसी: मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट में 92,385 से ज्यादा मामले लंबित हैं। कोविड-19 महामारी के बाद ई-फाइलिंग (E-filing) बढ़ने से मामलों की संख्या में तेजी आई है।
देशभर का कुल आंकड़ा..
सरकार द्वारा संसद (राज्यसभा) में दी गई जानकारी के मुताबिक, देश की सभी अदालतों में कुल 5.49 करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग हैं। इसमें से अकेले देश के 25 हाईकोर्ट्स में 63,63,406 मामले लंबित हैं।

