अमेरिका ने ईरान पर लगाए अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध, इन देशों पर भी पड़ेगा बड़ा असर
अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था के 5 महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। जिनका इस्तेमाल ईरान दूसरे देशों में अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए करता है।
इंटरनेशल डेस्क। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ शुरू करने का ऐलान किया है। इसके तहत ईरान की अर्थव्यवस्था से जुड़े पांच अहम क्षेत्रों को सेकेंडरी प्रतिबंधों के दायरे में लाया गया है। इनमें डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग शामिल हैं। अमेरिका का लक्ष्य ईरान की कमाई के रास्ते बंद करना और उसकी वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना है। अमेरिकी ट्रेजरी ने करीब 60 संस्थाओं, लोगों और जहाजों पर भी कार्रवाई की है।
5 सेक्टरों पर क्यों है अमेरिका की नजर
अमेरिकी सरकार के अनुसार, ईरान डिजिटल एसेट्स और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल प्रतिबंधों से बचने और धन के लेन-देन के लिए करता है। टेक्नोलॉजी सेक्टर पर इसलिए नजर है क्योंकि उन्नत तकनीक का इस्तेमाल हथियार कार्यक्रमों में हो सकता है।
सोने का इस्तेमाल ईरान अपनी मुद्रा पर दबाव कम करने के लिए कर रहा है। एविएशन और शिपिंग सेक्टर को लेकर अमेरिका का आरोप है कि इनका इस्तेमाल हथियार, संवेदनशील तकनीक, नकदी और तेल की आवाजाही में किया जाता है।
ईरान से कारोबार किया तो दूसरे देशों पर भी कार्रवाई
इन प्रतिबंधों का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रह सकता। अगर कोई विदेशी कंपनी या संस्था इन पांच क्षेत्रों में ईरान के साथ ऐसा कारोबार करती है, जिससे उसे आर्थिक फायदा मिलता है, तो उस पर भी अमेरिकी कार्रवाई का जोखिम रहेगा।
इसे सेकेंडरी प्रतिबंध कहा जाता है। अमेरिका ऐसे संस्थानों को अपनी वित्तीय व्यवस्था से अलग कर सकता है। खासतौर पर अमेरिकी बैंकिंग और डॉलर आधारित लेन-देन तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।
चीन, तुर्की और UAE पर भी नजर
अमेरिका ने अभी उन देशों की पूरी सूची जारी नहीं की है, जिन पर आगे सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। हालांकि ईरान के साथ कारोबार करने वाले प्रमुख देशों में चीन, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार रहा है।
UAE भी ईरान के साथ महत्वपूर्ण कारोबारी संबंध रखता रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि किसी देश या कंपनी को अमेरिकी प्रतिबंधों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाएगा।
बेसेंट बोले- ईरान के सामने दो रास्ते
स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ईरान के आर्थिक नेटवर्क पर व्यापक दबाव बनाने जा रहा है। उनके मुताबिक, ईरान के सामने अब दो रास्ते हैं। पहला रास्ता पूरी तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग पड़ना और सीमित स्तर की अर्थव्यवस्था तक सिमट जाना है। दूसरा रास्ता सामान्य स्थिति की ओर लौटना और वैश्विक अर्थव्यवस्था में दोबारा शामिल होने का मौका हासिल करना है।
सेकेंडरी प्रतिबंधों से कंपनियों को क्यों डर लगता है
अमेरिकी प्रतिबंधों का सबसे बड़ा दबाव डॉलर और बैंकिंग सिस्टम के जरिए आता है। अगर किसी विदेशी कंपनी पर अमेरिकी प्रतिबंध लगते हैं, तो उसके लिए अमेरिकी बैंकों और कंपनियों के साथ कारोबार करना मुश्किल हो सकता है।
कुछ मामलों में उसे अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से बाहर भी किया जा सकता है। इसी खतरे के कारण भारतीय, चीनी, तुर्की या UAE की कंपनियां ईरान के साथ कारोबार करने से पहले अमेरिकी नियमों और संभावित जोखिमों का आकलन करती हैं।
दुनिया के कारोबार में डॉलर की बड़ी भूमिका
अमेरिकी डॉलर की वैश्विक कारोबार और वित्तीय व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के करीब 85% व्यापार में डॉलर का इस्तेमाल होता है। वैश्विक केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी करीब 64% बताई गई है।
इसके अलावा दुनिया के करीब 39% कर्ज अमेरिकी डॉलर में दिए जाते हैं। इसी मजबूत स्थिति के कारण अमेरिकी प्रतिबंधों का असर सिर्फ अमेरिकी कंपनियों तक सीमित नहीं रहता।
भारत पर क्या हो सकता है असर
ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों का भारत पर सीधा असर पड़ना जरूरी नहीं है। हालांकि ईरान के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों को अमेरिकी नियमों का ध्यान रखना होगा।
भारत और ईरान के बीच ऊर्जा, बंदरगाह और व्यापार से जुड़े महत्वपूर्ण हित हैं। ऐसे में नए प्रतिबंधों से कुछ क्षेत्रों में कारोबार और भुगतान की प्रक्रिया मुश्किल हो सकती है।
तेल खरीद पर बढ़ सकता है दबाव
अगर भारतीय कंपनियां ईरान से कच्चा तेल खरीदती हैं, तो अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भुगतान और व्यापार की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। बैंकिंग चैनल, बीमा और शिपिंग से जुड़ी सेवाओं में भी अतिरिक्त जोखिम पैदा हो सकता है। भारत को ऐसे मामलों में अपनी ऊर्जा जरूरतों और अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा।
चाबहार पोर्ट पर भी नजर
ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक और कारोबारी रूप से महत्वपूर्ण है। भारत इस बंदरगाह के जरिए मध्य एशिया तक संपर्क बढ़ाने में रुचि रखता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे और उनके अमल का असर चाबहार से जुड़ी परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका किन गतिविधियों और संस्थाओं को आगे निशाने पर लेता है।
डॉलर में भुगतान हुआ तो मुश्किल
ईरान से जुड़े भारतीय कारोबार पर अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंध लगते हैं, तो डॉलर में लेन-देन करना कठिन हो सकता है। इसके साथ ही संबंधित कंपनियों को अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था और अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं तक अपनी पहुंच को लेकर जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि सेकेंडरी प्रतिबंधों का डर कई कंपनियों को ईरान से दूरी बनाने के लिए मजबूर कर सकता है।
भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती
अमेरिका भारत से ईरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करने की मांग कर सकता है। हालांकि भारत अपने राष्ट्रीय हित, ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर फैसला करेगा। ऐसे में नई अमेरिकी नीति भारत के लिए केवल आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक चुनौती भी बन सकती है। फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका किन देशों और कंपनियों पर आगे कार्रवाई करता है।

