मऊगंज में ज्वाला रूप में प्रकट हुईं मां अष्टभुजा, जानें धाम का 500 साल पुराना रहस्यमयी इतिहास
मऊगंज में ज्वाला के रूप में प्रकट हुई मां अष्टभुजा। देवीपुर स्थित माता अष्टभुजा धाम का ऐतिहासिक महात्तव।
मऊगंज। जिले के अंतर्गत नईगढ़ी कस्बे के देवीपुर नामक स्थान पर जगतजननी मां अष्टभुजा का उद्गम आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व माना जाता है। क्षेत्रीय बुजुर्गों और इतिहासकारों के अनुसार, जहां आज माता अष्टभुजा का धाम स्थित है, वहां कभी विशालकाय जंगल हुआ करता था।
इतिहासकारों के अनुसार, करीब 500 वर्ष पूर्व एक दिन घने जंगल के बीच अचानक तेज अग्नि की लपटों के साथ मां अष्टभुजा का उदय हुआ। घने जंगल के बीच अग्नि की ज्वाला निकल रही थी। तभी समीपवर्ती गांव लालगंज के निवासी एक यादव, पानी लेकर दीर्घ शंका को जा रहे थे। उनके मन में भावना हुई कि घने जंगल में जल रही आग से पूरा जंगल जल जाएगा।

आग से जंगल को बचाने के लिए यादव ने नासमझी में जलती ज्वाला में लोटा भर पानी डाल दिया। इसके परिणामस्वरूप जलती ज्वाला शांत हो गई। पानी डालने वाला यादव यह समझ नहीं पाया कि यह कोई साधारण आग नहीं थी, बल्कि इतनी तेज ज्वाला के साथ माता अष्टभुजा इस धरती पर पधार रही थीं।
स्वप्न में राजा प्रताप सिंह को दिए आदेश
यह वही समय था जब सेंगर वंश के राजा प्रताप सिंह पास में अपनी गढ़ी का निर्माण करा रहे थे। इस दौरान रात को सोते समय मां अष्टभुजा ने स्वप्न में राजा को संदेश दिया कि यह स्थान उनका है और यहां गढ़ी मत बनवाओ। इस पूरे क्षेत्र को श्रद्धालुओं के लिए छोड़ दो। माता ने राजा को यह भी कहा कि कल सुबह एक खरगोश को काला कुत्ता खदेड़ेगा, और जिस स्थान पर खरगोश को कुत्ता पकड़ लेगा, वहीं अपनी नई गढ़ी का निर्माण करा लेना।

अगली सुबह ऐसा ही हुआ। माता द्वारा स्वप्न में दिए गए आदेशानुसार सेंगर वंश के राजा ने वर्तमान नईगढ़ी का निर्माण कराया। इसी घटना के कारण नईगढ़ी का नाम प्रचलित हुआ। उस समय जब देवलहा नदी के जल से श्रद्धालु मां अष्टभुजा को जल चढ़ाते थे, उसी के नाम पर उस गांव का नाम देवीपुर पड़ा। समीपवर्ती कगास नदी से बनने वाले जलप्रपात को आज देवलहा जलप्रपात के नाम से जाना जाता है।
साधुराम कोड़रिया ने रखी थी मंदिर निर्माण की बुनियाद
कालांतर में मां अष्टभुजा मंदिर का निर्माण आज से लगभग 130 वर्ष पूर्व नईगढ़ी स्टेट के दुवगवां गांव निवासी ब्राह्मण साधुराम कोड़रिया द्वारा कराया गया। आगे चलकर माता रानी के भक्त मोतीलाल पांडेय सुमेदा, राजेंद्रमणि धर द्विवेदी हटवा भूधर द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया।

अलौकिक है माता का दरबार, भक्त चढ़ाते हैं जीभ
मां अष्टभुजा का दरबार अलौकिक है। धाम में सालभर हर दिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। विशेषकर सोमवार और गुरुवार के साथ दशहरा, रामनवमी और नवरात्रि पर्व, आषाढ़ व श्रावण मास की हरियाली पूजाई पर अंचल ही नहीं, दूसरे राज्यों से भी लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर यहां जिंदा बकरा या यहां तक कि जीभ चढ़ाते हैं।

माता के आशीर्वाद से जीभ चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं की जीभ वापस लौट आती है, और वे हंसते-हंसते घर लौटते हैं। श्रद्धालु यहां कीर्तन, भजन, यज्ञ, भंडारा, सत्यनारायण कथा, बच्चों का कर्ण छेदन और मुंडन कर मनचाहा वरदान मांगते हैं। माता रानी के दरबार से झोली भर आशीर्वाद लेकर जाते हैं।
हजारों परिवारों का होता है उदर पोषण
मंदिर परिसर में सैकड़ों दुकानों के माध्यम से हजारों परिवार माता रानी के आशीर्वाद से उदर पोषण कर रहे हैं। इस बीच शासन स्तर पर धर्मशाला, पानी की व्यवस्था जैसी सुविधाएं प्रदान की गई हैं।

हाल ही में राज्य शासन द्वारा मंजूर राशि से सर्व सुविधा युक्त सामुदायिक भवन और धर्मशाला का निर्माण कराया गया है। अंचल और अन्य प्रदेशों से आने वाले श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए अन्य सुविधाएं भी जुटाई जा रही हैं। जिला प्रशासन द्वारा विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं।
Varsha Shrivastava 
