BPL फर्जीवाड़ा: ट्रक मालिक, सरकारी कर्मचारी और जमींदार बने गरीब, उठा रहे मुफ्त का राशन
मऊगंज में बीपीएल सूची पर सवाल: अपात्र ले रहे सरकारी राशन, गरीबों को नहीं मिल रहा हक, दर-दर की ठोकरें खा रहे असली हकदार
मऊगंज से राजेंद्र पयासी की रिपोर्ट।
सरकार की मंशा थी कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ सिर्फ जरूरतमंद तक पहुंचे। लेकिन मऊगंज जिले में बीपीएल सूची ही फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा केंद्र बन गई है। हवेलीदार, जमींदार और पूंजीपति गरीबों के हक में खुलेआम डाका डाल रहे हैं और संबंधी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी सब जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं।
जिले के आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं। जिले की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी पहले से ही बीपीएल सूची में दर्ज है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। जमीनी हकीकत देखें तो ऐसे कई परिवार सूची में हैं जिनके पास 10 से 50 एकड़ जमीन है, शहर और गांव में पक्के मकान हैं, ट्रक-बस का कारोबार है, या परिवार का कोई सदस्य सरकारी सेवा में है। इसके बावजूद वे हर महीने उचित मूल्य की दुकान से मुफ्त राशन उठा रहे हैं।
लग्जरी कार और सरकारी नौकरी वाले बने गरीब
कुछ तो लग्जरी कार से दुकान पहुंचते हैं और राशन लेकर उसे 10 रुपए किलो के भाव में गांव और आसपास के बाजार में बेच देते हैं। यह स्थिति न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि उन वास्तविक गरीबों के साथ अन्याय हैय़ जिनके पास दो वक्त की रोटी के लिए भी अनाज नहीं है। योजना का उद्देश्य भूखे को भोजन देना था, न कि संपन्न लोगों को मुनाफा कमाने का जरिया बनाना।
गांव के सरपंच, सचिव और आम जनता इस सच्चाई से वाकिफ है। शहरी क्षेत्र में भी यही हाल है। फिर भी अपात्रों को सूची से बाहर करने की कोई ठोस पहल नहीं हो रही। खाद्य विभाग के पास आय, भूमि, वाहन और नौकरी के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, फिर भी क्रॉस वेरिफिकेशन नहीं हो रहा।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 और राज्य शासन के निर्देश स्पष्ट हैं कि पात्रता के मापदंडों पर खरा न उतरने वाले का नाम सूची से हटाया जाए। इसके बाद भी जांच और कार्यवाही की बजाय लापरवाही अनवरत जारी है।
प्रशासन से वैधानिक कार्यवाही मांग
बीपीएल के नाम पर चल रहे फर्जीवाड़े को लेकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलेश पटेल, राम सजीवन सोनी और क्षेत्र के समाजसेवियों ने प्रशासन से मांग करते हुए कहा कि जिले भर में बीपीएल सूची का भौतिक सत्यापन और नवीनीकरण किया जाए। आयकर, परिवहन, राजस्व और सेवा रिकॉर्ड से मिलान कर अपात्रों की पहचान हो।
प्रत्येक पंचायत और वार्ड में सूची सार्वजनिक कर निर्धारित समय सीमा के अंदर आपत्ति ली जाए। दोषी अधिकारियों और राशन बेचने वालों और गलत तरीके से फायदा लेने वालों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित हो। समाजसेवियों ने कहा यदि ईमानदारी से जांच हुई तो बड़ी संख्या में अपात्र बाहर होंगे और असली हकदारों को उनका अधिकार मिलेगा। अन्यथा गरीबी उन्मूलन के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति होती रहेगी।
Varsha Shrivastava 
