पश्चिम एशिया युद्ध में चीन क्यों पीछे हटा? पाकिस्तान के लिए क्या है ड्रैगन का मास्टर प्लान!
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि चीन ने ईरान का खुलकर साथ क्यों नहीं दिया। जहां अमेरिका और इजरायल के साथ टकराव बढ़ रहा है, वहीं बीजिंग सिर्फ बयानबाजी तक सीमित क्यों है?
चीन ने ईरान को इस युद्ध में "अकेला" छोड़ दिया है, क्योंकि बीजिंग की विदेश नीति सुरक्षा गारंटी पर नहीं, बल्कि लचीली पार्टनरशिप और हायरार्की (पैरामीटर या स्तरबद्ध महत्व) पर आधारित है। चीन किसी भी देश को "एक पर हमला, सब पर हमला" जैसी कानूनी बाध्यता नहीं देता, ताकि वह खुद युद्ध में फंस न जाए। उसकी प्राथमिकता हमेशा ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, और ताइवान/दक्षिण चीन सागर जैसे कोर इंटरेस्ट्स रहती है।
ईरान के साथ चीन का रिश्ता मजबूत है:
25 साल का कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप, ईरान चीन का बड़ा ऑयल सप्लायर है, और कुछ रिपोर्ट्स में BeiDou सैटेलाइट/इंटेलिजेंस सपोर्ट की बात भी आई है। लेकिन जब US-इजरायल ने फरवरी 2026 में हमले किए (Operation Epic Fury, जिसमें सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत भी हुई), चीन ने सिर्फ डिप्लोमैटिक कंडेम्नेशन किया, "संयम" की अपील की, और सीधा मिलिट्री सपोर्ट या गारंटी नहीं दी।
ऊर्जा और गल्फ स्टेबिलिटी पहले:
चीन गल्फ से बहुत सारा ऑयल इम्पोर्ट करता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से कीमतें आसमान छू गईं, लेकिन चीन नहीं चाहता कि युद्ध और फैले, क्योंकि इससे उसके सभी गल्फ पार्टनर्स (सऊदी, UAE आदि) प्रभावित होंगे। ईरान को फुल सपोर्ट देने से युद्ध बड़ा हो सकता है, जो चीन के लिए नुकसानदेह है।
कोई मिलिट्री एलायंस नहीं:
चीन "स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप" कहता है, लेकिन कोई म्यूचुअल डिफेंस क्लॉज नहीं। ईरान उपयोगी है (सैंक्शंस बाइपास, US को बैलेंस करने के लिए), लेकिन "एक्सपेंडेबल" भी, यानी जरूरत पड़ने पर छोड़ सकता है।
हायरार्की में ईरान नीचे:
यूके चाइना ट्रांसपेरेंसी के ट्रस्टी हॉवर्ड झांग (जिनका जिक्र आपके आर्टिकल में है) ने स्पष्ट कहा कि चीन रिश्तों को हायरार्की में देखता है। रूस सबसे ऊपर, उसके नीचे पाकिस्तान (ऑल-वेदर फ्रेंड, CPEC से अरब सागर तक एक्सेस, भौगोलिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण, चीन की वेस्टर्न फ्लैंक को एंकर करता है)। ईरान इससे नीचे है उपयोगी, लेकिन पाकिस्तान जितना "एम्बेडेड" या "क्रिटिकल" नहीं। झांग के शब्दों में: पाकिस्तान "too useful, too embedded and too geographically important" है, जबकि ईरान सिर्फ स्पॉइलर और सप्लायर है।
अब पाकिस्तान के बारे में:
अगर पाकिस्तान कभी किसी बड़े युद्ध में फंसा (जैसे भारत से), तो चीन की रणनीति अलग होगी। CPEC, Gwadar पोर्ट, और पाकिस्तान की भौगोलिक लोकेशन चीन के लिए स्ट्रैटेजिक डेप्थ देती है। पाकिस्तान को "ऑल-वेदर स्ट्रैटेजिक कोऑपरेटिव पार्टनर" कहा जाता है, और कई एक्सपर्ट्स (झांग सहित) मानते हैं कि चीन पाकिस्तान के लिए ज्यादा रिस्क लेगा, शायद मिलिट्री/इकोनॉमिक बैकिंग देगा, क्योंकि यह चीन की रीजनल सिक्योरिटी के लिए क्रिटिकल है। ईरान के केस में ऐसा नहीं हुआ।

संक्षेप में:
चीन ने ईरान को अकेला इसलिए छोड़ा क्योंकि ईरान उसकी हायरार्की में "उच्च स्तर" पर नहीं है, और चीन युद्ध से बचना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्ता ज्यादा गहरा और सिक्योरिटी-ओरिएंटेड है, इसलिए वहां चीन "दोस्ती" निभा सकता है। पाकिस्तान वाले खुश हो सकते हैं, क्योंकि चीन की प्राथमिकता में वे ईरान से ऊपर हैं!

