40 साल बाद बंद हुआ Bofors Case, Supreme Court ने आखिरी याचिका भी खारिज की

Supreme Court का बड़ा फैसला, Bofors Case पूरी तरह बंद, अदालत ने आखिरी याचिका भी खारिज की, घोटाले के आरोप से Rajiv Gandhi 1989 का चुनाव हारे थे

40 साल बाद बंद हुआ Bofors Case, Supreme Court ने आखिरी याचिका भी खारिज की

New Delhi। करीब 40 साल तक देश की राजनीति, न्याय व्यवस्था और रक्षा सौदों की चर्चा का केंद्र रहे Bofors Case पर अब पूरी तरह विराम लग गया है। Supreme Court ने इस मामले से जुड़ी आखिरी याचिका भी खारिज कर दी। इसी साथ देश के सबसे चर्चित राजनीतिक मामलों में शामिल Bofors Scam कानूनी रूप से अब खत्म हो गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, Justice J.B. Pardiwala और Justice K. Vinod Chandran की पीठ ने कहा कि अब इस मामले में आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने Delhi High Court के साल 2005 के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपील भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें Hinduja Brothers और Bofors Company को राहत दी गई थी।

क्या था Bofors Case?

यह मामला साल 1986 में भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी AB Bofors के बीच हुई लगभग 1,437 करोड़ रुपये की तोप खरीद डील से जुड़ा था। भारत ने सेना के लिए आधुनिक 155 mm Howitzer Guns खरीदने का फैसला किया था।

साल 1987 में स्वीडन रेडियो की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए कथित रूप से करोड़ों रुपये का कमीशन (रिश्वत) दिया गया। इसके बाद यह मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक विवादों में बदल गया। विपक्ष ने तत्कालीन Prime Minister Rajiv Gandhi की सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और यह मुद्दा पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।

1989 के चुनाव पर बड़ा असर

Bofors विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक असर 1989 के Lok Sabha Election में देखने को मिला। साल 1984 में रिकॉर्ड बहुमत के साथ सत्ता में आई Congress को 1989 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि Bofors विवाद ने उस समय सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। इसी दौर में तत्कालीन रक्षा मंत्री V.P. Singh ने सरकार से इस्तीफा दिया और बाद में भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर बड़े राजनीतिक अभियान का नेतृत्व किया। यह मामला उस समय भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारण बना।

केस अदालत में क्यों कमजोर पड़ गया?

Bofors Case कई दशकों तक अदालतों में चलता रहा, लेकिन जांच एजेंसियां आरोपों को कानूनी रूप से साबित नहीं कर सकीं। Delhi High Court ने 2005 के फैसले में कहा था कि CBI आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर सकी। अदालत के अनुसार, जांच में ऐसे प्रमाण नहीं मिले जिनसे सीधे तौर पर किसी आरोपी को कथित रिश्वत से जोड़ा जा सके।

जांच के दौरान स्वीडन से प्राप्त कई दस्तावेजों की प्रमाणिकता भी अदालत में साबित नहीं हो सकी। कोर्ट ने माना कि बिना प्रमाणित विदेशी दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति पर आपराधिक आरोप तय नहीं किए जा सकते।

इसके अलावा कथित कमीशन की रकम और आरोपित व्यक्तियों के बीच सीधा संबंध भी स्थापित नहीं किया जा सका। लंबे समय तक चली जांच, गवाहों की अनुपलब्धता और समय बीतने के साथ कई महत्वपूर्ण साक्ष्य भी कमजोर हो गए, जिससे मामला और कमजोर पड़ता चला गया।

CBI ने आखिरी समय तक की जांच की कोशिश

Supreme Court के अंतिम फैसले से पहले भी CBI इस मामले में नए साक्ष्य जुटाने का प्रयास करती रही। एजेंसी ने अमेरिका के जांच विशेषज्ञ Michael Hershman से जुड़े दस्तावेज और जानकारी हासिल करने की कोशिश की।

Michael Hershman ने 2017 में दावा किया था कि Bofors मामले की जांच पर उस समय राजनीतिक प्रभाव पड़ा था और वे इस संबंध में सहयोग करना चाहते थे। CBI ने Interpol और अमेरिकी अधिकारियों से कई बार संपर्क किया, लेकिन कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी।

बाद में एजेंसी ने साल 2025 में अदालत के माध्यम से Letter Rogatory जारी कर अमेरिका से आधिकारिक सहायता भी मांगी। हालांकि इससे भी जांच को कोई निर्णायक सबूत नहीं मिला।

CBI की कार्यप्रणाली पर भी उठे सवाल

इस पूरे मामले में जांच एजेंसी CBI की भूमिका भी लगातार सवालों के घेरे में रही। जानकारी के अनुसार, इस जांच पर करीब 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन इतने लंबे समय और भारी खर्च के बावजूद एजेंसी अदालत में मजबूत साक्ष्य पेश नहीं कर सकी।

Supreme Court ने 2018 में यह भी टिप्पणी की थी कि CBI ने Delhi High Court के फैसले के खिलाफ अपील करने में करीब 12 साल यानी 4522 दिन की देरी की। अदालत ने इतनी लंबी देरी पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इसका संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।

High Court ने भी कहा था कि अधूरे और अप्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का सही उपयोग नहीं माना जा सकता।

Bofors तोप ने Kargil War में निभाई अहम भूमिका

हालांकि Bofors तोप विवादों में रही, लेकिन सेना के लिए इसकी उपयोगिता बाद में पूरी दुनिया ने देखी। साल 1999 के Kargil War में Bofors Howitzer Guns भारतीय सेना के लिए बेहद प्रभावी साबित हुईं।

ऊंचे पहाड़ी इलाकों में छिपे पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक निशाना लगाने, लंबी दूरी तक फायर करने और कठिन परिस्थितियों में लगातार संचालन की क्षमता ने भारतीय सेना को महत्वपूर्ण बढ़त दिलाई। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि Kargil युद्ध में Bofors तोपों ने भारतीय सेना की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

40 साल बाद कानूनी अध्याय समाप्त

करीब चार दशक तक चले इस मामले में अब Supreme Court के फैसले के साथ कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त हो गई है। Bofors Case भारतीय राजनीति, न्यायिक प्रक्रिया और रक्षा खरीद व्यवस्था के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

इस मामले ने देश में रक्षा सौदों में पारदर्शिता, जांच एजेंसियों की भूमिका और राजनीतिक जवाबदेही पर लंबे समय तक बहस को जन्म दिया। अब अदालत के अंतिम निर्णय के बाद यह मामला इतिहास का हिस्सा बन गया है।