धर्म बदला तो खत्म हो गया SC का दर्जा! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा - केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा पा सकते हैं। ईसाई या अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर SC स्टेटस तुरंत खत्म। 

धर्म बदला तो खत्म हो गया SC का दर्जा! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली: देश में आरक्षण और अनुसूचित जाति के दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े व्यक्ति ही अनुसूचित जाति (SC) का लाभ ले सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण कर लेता है, तो उसका SC दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है।

जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने यह फैसला देते हुए कहा कि संविधान आदेश 1950 के अनुसार, SC का लाभ केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्मों तक ही सीमित है। ईसाई बनने वाले दलित व्यक्ति को SC-ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कोई सुरक्षा या आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता।

मामला क्या था:
यह फैसला आंध्र प्रदेश के चिंथदा आनंद (जिन्हें चिंथदा आनंद पॉल भी कहा जाता है) के मामले में आया है। मूल रूप से माला समुदाय (Scheduled Caste) से ताल्लुक रखने वाले आनंद ने ईसाई धर्म अपनाकर पादरी बन गए थे। वे पिछले 10 साल से चर्च में पादरी के रूप में कार्यरत थे। आनंद ने जातिगत भेदभाव का आरोप लगाते हुए SC-ST एक्ट के तहत केस दर्ज कराया था। लेकिन आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पहले ही उनके केस को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आनंद की याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने कहा:
“जब व्यक्ति खुद स्वीकार कर चुका है कि वह ईसाई है, तो उसे SC का दर्जा नहीं मिल सकता। केवल जाति प्रमाणपत्र होने भर से SC-ST एक्ट लागू नहीं होता।”



सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख:
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई फैसलों में कहा है कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म बदलना संविधान के साथ धोखा है। कोर्ट ने इस मामले में भी दोहराया कि धर्मांतरण के बाद SC-ST के लाभ की मांग गलत है। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले ही अनुसूचित जाति माने जाएंगे। ईसाई या मुस्लिम धर्म अपनाने वाले दलित इस दायरे से बाहर हैं।

क्या होगा आगे का असर:
यह फैसला उन सभी मामलों पर मुहर लगाता है जहां लोग धर्मांतरण के बाद भी SC-ST आरक्षण, सरकारी नौकरियों में कोटा या अत्याचार निवारण कानून का लाभ लेने की कोशिश करते रहे हैं। अब राज्यों को इस फैसले के अनुसार सख्ती से पालन करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आरक्षण नीति की मूल भावना को मजबूत करेगा और “आरक्षण के लिए धर्मांतरण” की प्रवृत्ति पर लगाम लगाएगा।

आपकी राय क्या है:

  • क्या धर्म बदलने के बाद भी SC-ST लाभ मिलना चाहिए या नहीं?
  • क्या यह फैसला संविधान की मूल भावना के अनुरूप है?