होली पर बदला ट्रेंड: भोपाल के बाजारों में ‘वोकल फॉर लोकल’ की गूंज
भोपाल में होली बाजार इस बार ‘मेक इन इंडिया’ के रंग में रंगा दिख रहा है, जहां ग्राहक स्वदेशी और हर्बल उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं और चीनी सामान की हिस्सेदारी घट रही है।
भोपाल: होली की आहट के साथ बाजारों में फिर से रंगों की चहल-पहल लौट आई है, लेकिन इस बार खरीदारी का अंदाज बदला हुआ है। जहां पहले पिचकारी, मास्क और रंगों के काउंटर पर विदेशी-खासकर चीनी-उत्पादों की भरमार रहती थी, वहीं अब स्वदेशी सामान की मांग बढ़ गई है। भारतीय उत्पादों ने मजबूत पकड़ बना ली है। ग्राहक खुद दुकानदार से पूछ रहे हैं-“यह सामान देशी है ना” व्यापारियों के मुताबिक आयात में कमी, स्थानीय इकाइयों को बढ़ावा और सुरक्षित रंगों के प्रति जागरूकता ने बाजार की तस्वीर बदल दी है। भोपाल किराना व्यापारी महासंघ के महामंत्री विवेक साहू बताते हैं कि हर्बल और ऑर्गेनिक रंगों की बिक्री में इस साल उछाल दर्ज किया गया है। एमएसएमई और स्टार्टअप इकाइयों की सक्रिय भागीदारी से स्थानीय उद्योगों को सीधा फायदा हुआ है।अब चीन पर निर्भरता लगातार घट रही है।

देशभर में कारोबार का अनुमान
होली का राष्ट्रीय कारोबार इस बार करीब 18 से 22 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें विदेशी सामान की हिस्सेदारी घटकर लगभग 18–25 प्रतिशत (करीब 3,500–5,000 करोड़ रुपये) रह गई है, जबकि एक दशक पहले यह 70 प्रतिशत से अधिक हुआ करती थी।
किस उत्पाद में कितना स्वदेशी असर
गुलाल और हर्बल रंग – 90 से 100% भारतीय
मास्क और कैरेक्टर आइटम – 60–70% भारतीय
कलर/फोम स्प्रे – 50–60% भारतीय
पानी के गुब्बारे – 60–70% भारतीय
टैंक व कार्टून पिचकारी – अब भी 55–65% तक विदेशी हिस्सेदारी
भोपाल के बाजारों की तस्वीर
चौक, आजाद मार्केट, इतवारा, मारवाड़ी रोड, लोहा बाजार, भेल, 10 नंबर, बैरागढ़ और करोंद जैसे प्रमुख बाजारों में हर्बल गुलाल और देसी पिचकारी की मांग तेज है। साधारण रंग और पिचकारी लगभग पूरी तरह भारतीय हो चुके हैं, जबकि बैटरी या म्यूजिकल थीम वाले उत्पादों में आंशिक विदेशी निर्भरता अभी बनी हुई है।थोक व्यापारियों का कहना है कि केमिकल रंगों की मांग घटी है। लोग बच्चों की त्वचा और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए टेसू के फूलों से बने रंग और प्राकृतिक गुलाल को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भोपाल संभाग में अनुमानित कारोबार (रंग पंचमी तक)
रंग-गुलाल: 20–30 करोड़
पिचकारी-खिलौने: 8–10 करोड़
मिठाई-नमकीन: 20–25 करोड़
कपड़े: 10–15 करोड़
भांग-ठंडाई: 5–10 करोड़
डीजे-टेंट: 10–12 करोड़
किराना-डेयरी: 20–30 करोड़
पूजा सामग्री: 10–20 करोड़
कुल मिलाकर संभाग में 100 से 150 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान है। सबसे अधिक फायदा किराना, डेयरी, मिठाई और फुटकर व्यापार से जुड़े व्यवसायियों को मिल रहा है।
बाजार रेट (औसत)
लोकल गुलाल (100 ग्राम): ₹15–25
हर्बल गुलाल (100 ग्राम): ₹50–120
छोटी पिचकारी: ₹20–40
टैंक पिचकारी: ₹350–700
कलर स्प्रे: ₹80–150
स्नो स्प्रे: ₹120–220
होली टी-शर्ट: ₹120–350
इस बार की होली सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि स्वदेशी उत्पादों की बढ़ती स्वीकार्यता की भी कहानी कह रही है। राजधानी के बाजारों में ‘लोकल के लिए वोकल’ का रंग पहले से कहीं ज्यादा चटक नजर आ रहा है।
sanjay patidar 
