Foreign Funding Law पर सियासी संग्राम, शशि थरूर बोले- सबसे ज्यादा मार आम लोगों पर पड़ेगी

Foreign Funding Law में प्रस्तावित बदलाव पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केंद्र सरकार को घेरा. उन्होंने कहा कि नए कानून का सबसे बड़ा असर आम भारतीयों और सामाजिक संस्थाओं पर पड़ेगा.

Foreign Funding Law पर सियासी संग्राम, शशि थरूर बोले- सबसे ज्यादा मार आम लोगों पर पड़ेगी

नई दिल्ली. संसद में विदेशी फंडिंग से जुड़े कानून में प्रस्तावित बदलाव को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार के नए प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह बदलाव सिर्फ गैर-सरकारी संस्थाओं (NGO) तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर उन लाखों लोगों पर भी पड़ेगा जो इन संस्थाओं से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाएं प्राप्त करते हैं.

थरूर का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन सरकार को पहले से अधिक अधिकार देता है. उनके मुताबिक यदि किसी संस्था का विदेशी फंडिंग लाइसेंस रद्द होता है या उसका नवीनीकरण नहीं हो पाता, तो उसकी संपत्तियों और कामकाज पर सरकारी हस्तक्षेप बढ़ सकता है. उनका आरोप है कि इससे समाजसेवी संस्थाओं के स्वतंत्र तरीके से काम करने की क्षमता प्रभावित होगी.

कांग्रेस सांसद ने कहा कि देश के कई अस्पताल, स्कूल, राहत कार्य करने वाले संगठन और सामाजिक संस्थाएं विदेशी सहायता के जरिए अपनी सेवाएं संचालित करती हैं. अगर इन संस्थाओं के सामने कानूनी या प्रशासनिक बाधाएं बढ़ती हैं तो सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होगी जो इन सेवाओं पर निर्भर हैं. इसी वजह से उन्होंने कहा कि इस कानून का वास्तविक असर आम भारतीयों को झेलना पड़ेगा.

हालांकि केंद्र सरकार इस दावे से सहमत नहीं है. सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य विदेशी फंड के इस्तेमाल को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है. सरकार का तर्क है कि देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए कानून में बदलाव जरूरी हैं, ताकि किसी भी तरह के दुरुपयोग को रोका जा सके.

क्या है FCRA?

FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act ऐसा कानून है जो तय करता है कि भारत में कौन-सी संस्थाएं विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकती हैं और उस धन का उपयोग किन नियमों के तहत होगा. इस कानून के तहत पंजीकृत संस्थाओं को समय-समय पर अपनी वित्तीय जानकारी सरकार को उपलब्ध करानी होती है.

विवाद की वजह क्या है?

विपक्ष का आरोप है कि नए संशोधन से सरकार के पास गैर-सरकारी संस्थाओं पर अधिक नियंत्रण का अधिकार आ जाएगा. वहीं सरकार का कहना है कि यह बदलाव केवल निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जा रहा है. इसी मुद्दे पर संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है.

आने वाले दिनों में इस विधेयक पर संसद में विस्तृत चर्चा होने की संभावना है. इसके बाद ही तय होगा कि प्रस्तावित संशोधन मौजूदा स्वरूप में कानून बनता है या उसमें कोई बदलाव किया जाता है.