यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का लंबा कार्यकाल चर्चा में, यूनिफॉर्म आदेश के बाद फिर सुर्खियों में

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल Anandiben Patel एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह प्रदेश के सभी राजकीय विश्वविद्यालयों में छात्रों के लिए यूनिफॉर्म अनिवार्य करने का उनका फैसला है।

यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का लंबा कार्यकाल चर्चा में, यूनिफॉर्म आदेश के बाद फिर सुर्खियों में

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल इन दिनों देश के राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में जबरदस्त चर्चा का विषय बनी हुई हैं। उनकी इस चर्चा के पीछे दो मुख्य वजहें हैं- पहला, उनका राज्य के विश्वविद्यालयों को लेकर लिया गया एक बड़ा फैसला और दूसरा, उत्तर प्रदेश के इतिहास में बतौर राज्यपाल उनका अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल। 29 जुलाई 2019 को उत्तर प्रदेश की कमान संभालने वाली आनंदीबेन पटेल को इस पद पर रहते हुए लगभग 7 साल होने वाले हैं, जो साल 1950 के बाद से यूपी में किसी भी राज्यपाल का सबसे लंबा कार्यकाल है।

पहली बड़ी वजह: 
यूनिवर्सिटीज में 'यूनिफॉर्म' लागू करने का ऐतिहासिक फैसला

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने राज्य के विश्वविद्यालयों के पदेन कुलाधिपति (Chancellor) की हैसियत से एक बड़ा आदेश जारी किया है-
क्या है आदेश: 
उत्तर प्रदेश के सभी राजकीय विश्वविद्यालयों (State Universities) में अब छात्रों के लिए यूनिफॉर्म पहनकर आना अनिवार्य कर दिया गया है।

बदलाव: 
इससे पहले सिर्फ 12वीं कक्षा तक ही ड्रेस कोड अनिवार्य माना जाता था, लेकिन अब स्नातक (Graduation) और उससे ऊपर के उच्च शिक्षण संस्थानों में भी इसे लागू कर दिया गया है।

फैसले पर छिड़ा सियासी घमासान
विरोध:
समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद एसटी हसन ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों में यूनिफॉर्म को अनिवार्य करना व्यावहारिक रूप से सही नहीं है।

समर्थन: 
उत्तर प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि इससे छात्र एक समान दिखेंगे और दूर से ही उनकी अनुशासित पहचान हो सकेगी।

दूसरी बड़ी वजह: 1950 के बाद यूपी में सबसे लंबा कार्यकाल
आमतौर पर देश में राज्यपाल का कार्यकाल 5 साल का होता है, लेकिन आनंदीबेन पटेल 5 वर्ष की अवधि पूरी करने के बाद भी लगातार पद पर बनी हुई हैं। संविधान के जानकार प्रभाकर मिश्रा के अनुसार- "संविधान के अनुच्छेद 156 के तहत राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, लेकिन वे 'राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत' अपना पद धारण करते हैं। इसका मतलब है कि जब तक केंद्र सरकार और राष्ट्रपति चाहें, कोई भी राज्यपाल अपने पद पर बना रह सकता है।"

राजनीतिक गलियारों में उठते सवाल और मौन पर विवाद
आनंदीबेन पटेल के इस रिकॉर्ड कार्यकाल को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं- 
विपक्ष का आरोप:
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहम्मद आज़म का कहना है कि राज्य में बुलडोज़र कार्रवाई, एनकाउंटर या शिक्षक भर्ती जैसे बड़े मुद्दों पर राज्यपाल पूरी तरह 'मौन' रहती हैं और सरकार से कोई जवाब-तलब नहीं करतीं, इसलिए उनका कार्यकाल बढ़ाया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकारों का विश्लेषण:
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के कारण टकराव की स्थिति नहीं बनती। साथ ही, आनंदीबेन पटेल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अटूट विश्वास हासिल है, जिससे वे बिना किसी राजनीतिक विवाद के कुशलता से काम कर रही हैं।

शिक्षिका से मुख्यमंत्री और फिर राज्यपाल बनने का सफर
आनंदीबेन पटेल का जन्म 1941 में गुजरात के मेहसाणा में हुआ था। राजनीति में आने से पहले वे एक शिक्षिका थीं। उनके जीवन में 1987 की एक घटना ने सब कुछ बदल दिया:

  1. असाधारण साहस:
     स्कूल पिकनिक के दौरान नर्मदा नदी (सरदार सरोवर जलाशय) में डूब रही दो छात्राओं को बचाने के लिए आनंदीबेन अपनी जान की परवाह किए बिना पानी में कूद गईं और उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लाईं।

  2. राजनीति में एंट्री: 
    इस बहादुरी के लिए उन्हें राज्य सरकार से वीरता पुरस्कार मिला, जिसके बाद केशुभाई पटेल उन्हें राजनीति में लेकर आए।

  3. पीएम मोदी से जुड़ाव:
     वर्ष 2001 में नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद वे सरकार में शिक्षा और राजस्व जैसे भारी मंत्रालयों की मंत्री रहीं। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो आनंदीबेन को गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री बनाया गया था।