मौत बनकर दौड़ रहीं प्राइवेट एंबुलेंस! नियमों की उड़ रही धज्जियां, प्रशासन गहरी नींद में
रीवा में निजी एंबुलेंस सेवाओं में भारी लापरवाही है। कई एंबुलेंस में जरूरी जीवनरक्षक उपकरण नहीं हैं और कुछ बिना नियमों के चल रही हैं। मरीजों से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं और उन्हें जबरदस्ती प्राइवेट अस्पताल ले जाया जाता है।
जिले में आपातकालीन हेल्थ सर्विस के नाम पर बड़ी लापरवाही सामने आ रही है। यहां 200 से ज्यादा निजी एंबुलेंस सड़कों पर दौड़ रही हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर में बेसिक लाइफ सेविंग उपकरण ही नहीं हैं।
सबसे बड़ी बात ये है कि कई एंबुलेंस बिना हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट के ही चल रही हैं, जबकि इसको लेकर कोर्ट के सख्त निर्देश हैं।

मरीजों से वसूली का खेल
सरकारी अस्पतालों के आसपास खड़ी रहने वाली इन एंबुलेंस के चालकों पर आरोप है कि वो मरीजों और उनके घर वालों से ज्यादा पैसे वसूलते हैं। कई बार मरीजों को अपनी मर्जी के प्राइवेट हॉस्पिटल्स में ले जाया जाता है, जहां से ड्राइवर्स को कमीशन मिलता है।

प्रशासन को जानकारी नहीं
जिले में कितनी निजी एंबुलेंस चल रही हैं, इसका सही आंकड़ा भी स्वास्थ्य और परिवहन विभाग के पास नहीं है। इनकी जांच या ऑडिट भी नियमित रूप से नहीं हो रहा है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एंबुलेंस में लगी ऑक्सीजन किट की जांच हर महीने होनी चाहिए। इसके अलावा हर छह महीने में पूरी किट का विस्तृत ऑडिट और साल में एक बार संपूर्ण ऑडिट होना जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि ऑक्सीजन सिलेंडर, रेगुलेटर और मास्क सही स्थिति में हैं और जरूरत पड़ने पर मरीज की जान बचा सकते हैं। लेकिन जिले में यह नियम अब तक लागू नहीं हो रहा है

सुविधाओं की हकीकत
सरकारी 108 एंबुलेंस की तुलना में निजी एंबुलेंस में सुविधाएं बेहद कम हैं। ज्यादातर में केवल एक-दो ऑक्सीजन सिलेंडर, स्ट्रेचर और फर्स्ट एड बॉक्स ही मिलता है। जबकि हार्ट मॉनिटर और डेफिब्रिलेटर जैसी जरूरी जीवनरक्षक मशीनें लगभग मौजूद ही नहीं हैं।
जरूरी उपकरण और नियम
नियमों के मुताबिक हर एंबुलेंस में ऑक्सीजन किट, फर्स्ट एड किट, हार्ट मॉनिटर, डेफिब्रिलेटर, स्ट्रेचर, संचार के साधन जैसे मोबाइल या रेडियो, और अलार्म व लाइट जैसी सुविधाएं होना अनिवार्य है। इन उपकरणों के बिना मरीजों को सही समय पर और सुरक्षित इलाज मिलना लगभग असंभव है।

