7 साल बाद उत्तर कोरिया जाएंगे शी जिनपिंग, पुतिन-किम की बढ़ती नजदीकी से चीन की बढ़ी चिंता

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 8-9 जून को सात साल बाद उत्तर कोरिया के दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से होगी। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब रूस और उत्तर कोरिया के बीच रिश्ते अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद किम जोंग उन को रूस से आर्थिक, तकनीकी और सैन्य सहयोग मिला है, जिससे उत्तर कोरिया की चीन पर निर्भरता कुछ कम हुई है।

7 साल बाद उत्तर कोरिया जाएंगे शी जिनपिंग, पुतिन-किम की बढ़ती नजदीकी से चीन की बढ़ी चिंता

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले हफ्ते उत्तर कोरिया के ऐतिहासिक दौरे पर जा रहे हैं, जहां वे प्योंगयांग में वहां के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे। दोनों देशों के सरकारी मीडिया के अनुसार, यह बेहद संवेदनशील और रणनीतिक यात्रा 8 से 9 जून तक होगी। शी जिनपिंग आखिरी बार साल 2019 में उत्तर कोरिया गए थे। करीब 7 साल बाद हो रही यह यात्रा ऐसे समय में तय हुई है, जब रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकी ने बीजिंग (चीन) की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अब उत्तर कोरिया सिर्फ चीन के भरोसे नहीं रहा है।

पुतिन-किम की बढ़ती नजदीकी से परेशान हैं जिनपिंग
यूक्रेन युद्ध के बाद से वैश्विक समीकरण तेजी से बदले हैं। कुछ साल पहले तक उत्तर कोरिया पूरी तरह से अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए चीन के दबदबा क्षेत्र में था, लेकिन अब मॉस्को (रूस) और प्योंगयांग के रिश्ते बेहद मजबूत हो गए हैं:

  1. सैनिक और हथियारों की डील: 
    उत्तर कोरिया ने यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद के लिए अपने सैनिक और भारी मात्रा में गोला-बारूद भेजे हैं।
  2. रूस से मिला अरबों का फंड:
     इसके बदले में पुतिन सरकार ने उत्तर कोरिया को तेल, खाद्यान्न और सबसे महत्वपूर्ण- एडवांस मिसाइल व हथियार तकनीक के रूप में अरबों डॉलर की मदद दी है।

एशिया सोसाइटी के सीनियर फेलो जॉन डिल्यूरी के मुताबिक, चीन निश्चित रूप से रूस और उत्तर कोरिया की इस नई जुगलबंदी से असहज और चिंतित है। जिनपिंग की यह यात्रा इसी चिंता का जवाब है, ताकि वे दुनिया और किम जोंग को यह याद दिला सकें कि उत्तर कोरिया के असली 'गॉडफादर' वही हैं।

'जूनियर पार्टनर' नहीं बनना चाहते किम जोंग, स्थिति हुई मजबूत
साल 2019 में जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ परमाणु वार्ता विफल हुई और फिर कोविड महामारी आई, तो किम जोंग उन काफी कमजोर स्थिति में थे। चीन के साथ व्यापार ठप होने से देश की आर्थिक कमर टूट चुकी थी। लेकिन किम ने यूक्रेन युद्ध के संकट को अपने लिए एक बड़े अवसर में बदल दिया:

  • चीन पर निर्भरता कम की: रूस से मिली भारी आर्थिक रियायतों के दम पर किम जोंग अब खुद को चीन के एक छोटे 'जूनियर पार्टनर' के रूप में नहीं देखना चाहते।
  • चीन से मोलभाव की ताकत: रूस का कार्ड खेलकर किम जोंग अब चीन से व्यापार, ट्रेनों की आवाजाही और चीनी पर्यटकों को अपने देश के नए रिसॉर्ट्स में बुलाने के लिए ज्यादा रियायतें हासिल कर रहे हैं।

चीन और उत्तर कोरिया की वो 'अनोखी सैन्य संधि'
चीन और उत्तर कोरिया के बीच करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है। दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक रक्षा संधि है, जिसके इस साल 65 साल पूरे हो रहे हैं।

खास बात:
यह पूरी दुनिया में चीन की किसी भी देश के साथ की गई एकमात्र 'सैन्य और रक्षा संधि' है। इस समझौते के तहत यदि चीन या उत्तर कोरिया में से किसी भी एक देश पर कोई दूसरा देश हमला करता है, तो दूसरा देश अपनी सेना के साथ उसकी मदद के लिए युद्ध में कूद पड़ेगा।

क्या परमाणु मुद्दे पर बदलेगा चीन का स्टैंड?
पहले अमेरिका, रूस और चीन तीनों ही उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ थे और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में मिलकर प्रतिबंध लगाते थे। लेकिन अब पासा पलट चुका है:

  1. रूस का खुला समर्थन: मार्च 2024 में रूस ने संयुक्त राष्ट्र के उस पैनल के कार्यकाल को बढ़ाने पर वीटो लगा दिया, जो उत्तर कोरिया के परमाणु प्रतिबंधों की निगरानी करता था। यानी पुतिन ने सीधे तौर पर किम के परमाणु कार्यक्रम को ढाल दे दी।
  2. चीन का रुख भी हुआ नरम: चीन भी अब UNSC में उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षणों की निंदा करने से कतराता है और इसका दोष अमेरिका के सैन्य अभ्यासों पर मढ़ देता है।

व्हाइट हाउस लौटने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भले ही किम जोंग उन से दोबारा बातचीत करना चाहते हों, लेकिन किम जोंग ने साफ कर दिया है कि उनके परमाणु हथियार उनकी सुरक्षा की गारंटी हैं और वे इस पर कोई समझौता नहीं करेंगे।