Raksha Bandhan 2026 : आज पूरी दिन पंचक, जानिए राखी बांधने के तीन सबसे शुभ मुहूर्त

Raksha Bandhan 2026 : इस बार राखी बांधने के लिए भद्रा का कोई व्यवधान नहीं है। ग्रंथों में सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच रक्षाबंधन करने की परंपरा बताई गई है।

Raksha Bandhan 2026 : आज पूरी दिन पंचक, जानिए राखी बांधने के तीन सबसे शुभ मुहूर्त

Raksha Bandhan 2026 : आज सावन महीने की पूर्णिमा है और देशभर में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जा रहा है। इस बार राखी बांधने के लिए भद्रा का कोई व्यवधान नहीं है। ग्रंथों में सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच रक्षाबंधन करने की परंपरा बताई गई है। इसी आधार पर आज सुबह 6:15 बजे से शाम 7 बजे तक राखी बांधने के तीन शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। भाई-बहन इस दौरान अपनी सुविधा और शुभ समय के अनुसार रक्षासूत्र बांध सकते हैं।

आज राखी बांधने के 3 शुभ मुहूर्त

इस बार भद्रा नहीं होने के कारण रक्षाबंधन के दिन दिनभर राखी बांधने के लिए तीन शुभ समय बताए गए हैं। पहला मुहूर्त सुबह 6:15 बजे से 11 बजे तक रहेगा। दूसरा शुभ समय दोपहर 12:30 बजे से 2 बजे तक है। इसके बाद तीसरा मुहूर्त शाम 5:30 बजे से 7 बजे तक रहेगा। धार्मिक परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन सूर्योदय से सूर्यास्त तक किया जाता है। इसलिए भाई-बहन इन बताए गए शुभ समय में राखी बांधकर त्योहार मना सकते हैं।

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अब जानिये राखी बांधने का हजारों साल पुराना इतिहास

हजारों साल पुराना है रक्षा सूत्र

आज रक्षाबंधन मुख्य रूप से भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प का त्योहार माना जाता है। हालांकि हजारों साल पहले इसका स्वरूप अलग था। अथर्ववेद में रक्षा के उद्देश्य से सोना और मणि बांधने का उल्लेख मिलता है। रामायण में भी रक्षा सूत्र का प्रसंग मिलता है।

वनवास पर जाने से पहले माता कौशल्या ने भगवान राम के लिए औषधियों से रक्षा सूत्र तैयार किया था। इससे पता चलता है कि प्राचीन समय में रक्षा सूत्र को सुरक्षा और मंगल की कामना से जोड़ा जाता था।

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श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताई थी विधि

रक्षाबंधन की परंपरा का उल्लेख भविष्योत्तर पुराण में भी मिलता है। इसमें बताया गया है कि श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सावन महीने की पूर्णिमा पर रक्षाबंधन करने की पूरी विधि बताई थी। समय के साथ रक्षा सूत्र बांधने की यह परंपरा एक व्यवस्थित धार्मिक कर्म का रूप लेने लगी।

13वीं सदी तक रक्षाबंधन के लिए निश्चित नियम और मंत्र भी प्रचलन में आ चुके थे। इस दौर में यह केवल एक सामान्य धागा बांधने की परंपरा नहीं रह गई थी, बल्कि इसका धार्मिक महत्व भी स्थापित हो चुका था।

मुगल दरबार तक पहुंची राखी

रक्षाबंधन की परंपरा आगे चलकर राजघरानों और मुगल दरबार तक भी पहुंची। अकबर के दौर में राखी मुगल दरबार तक पहुंचने की बात कही जाती है। इसके बाद जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में इस धागे को राखी नाम दिए जाने का उल्लेख किया।

17वीं सदी में इस परंपरा का सबसे साफ ऐतिहासिक जिक्र जहांगीर की आत्मकथा तुजुक-ए-जहांगीरी में मिलता है। जहांगीर लिखता है कि सावन में ब्राह्मण नदी और तालाब के किनारे जाकर मंत्र पढ़ते और रंगीन धागों को अभिमंत्रित करते थे।

18वीं सदी में राजपूत महिलाएं राजाओं को राखियां बांधने के लिए लेकर आती थीं। उस समय राखी केवल पारिवारिक रिश्ते तक सीमित नहीं थी, बल्कि सुरक्षा और सामाजिक संबंधों का प्रतीक भी बन गई थी।

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19वीं सदी में बदला राखी का रिश्ता

19वीं सदी में रक्षाबंधन की परंपरा ने एक और रूप लिया। इस दौरान राखी देकर किसी भी पुरुष को भाई बनाने की परंपरा शुरू होने का उल्लेख मिलता है। इस तरह राखी का रिश्ता केवल जन्म से जुड़े भाई-बहन तक सीमित नहीं रहा।

यह सामाजिक और भावनात्मक संबंध बनाने का माध्यम भी बन गया। समय के साथ रक्षाबंधन ने भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प वाले त्योहार का व्यापक रूप ले लिया।