चंद्रयान-4 मिशन: ISRO ने चंद्रमा के साउथ पोल के पास मॉन्स माउटन क्षेत्र को चुना, सैंपल लेकर लौटेगा मिशन
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने महत्वाकांक्षी चंद्रयान-4 मिशन के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंडिंग साइट की पहचान कर ली है। चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिली हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों के आधार पर मॉन्स माउटन (MM-4) क्षेत्र को सबसे सुरक्षित लैंडिंग साइट माना गया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने सबसे चुनौतीपूर्ण मून मिशन चंद्रयान-4 के लिए चंद्रमा के साउथ पोल के पास एक संभावित लैंडिंग साइट की पहचान कर ली है। वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिली हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों के अध्ययन के बाद मॉन्स माउटन (MM-4) क्षेत्र को लैंडिंग के लिए सबसे उपयुक्त माना है।
मॉन्स माउटन क्यों है खास
मॉन्स माउटन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित लगभग 6,000 मीटर ऊंचा पहाड़ी क्षेत्र है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी चोटी काफी हद तक सपाट है, जो लैंडर को सुरक्षित रूप से उतारने के लिए जरूरी मानी जाती है। हालांकि ISRO ने स्पष्ट किया है कि लैंडिंग साइट को लेकर अंतिम निर्णय लॉन्च के समय के करीब लिया जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार यह इलाका इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि यहां लंबे समय तक सूर्य की रोशनी उपलब्ध रहती है। इससे लैंडर और अन्य उपकरणों को ऊर्जा मिलती रहेगी। साथ ही, इस क्षेत्र में वॉटर आइस मौजूद होने की संभावना भी जताई गई है, जो भविष्य के मानव मिशनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
चंद्रयान-2 की तस्वीरों से मिली अहम जानकारी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रिसर्च को लूनर एंड प्लैनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस में पेश किया गया। लैंडिंग साइट के चयन में चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर लगे ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा (OHRC) की तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है।यह कैमरा चंद्र सतह को लगभग 32 सेंटीमीटर प्रति पिक्सल के रेजोल्यूशन में दिखाता है। इससे छोटे-छोटे क्रेटर, पत्थर, ढलान और सतह की बनावट को बेहद साफ तरीके से देखा जा सकता है। इसी की मदद से वैज्ञानिकों ने खतरनाक इलाकों की पहचान पहले ही कर ली है।
MM-4 साइट को सबसे सुरक्षित क्यों माना गया
स्टडी के दौरान मॉन्स माउटन क्षेत्र की चार अलग-अलग संभावित लैंडिंग साइट्स का विश्लेषण किया गया, जिनमें MM-4 को सबसे सुरक्षित माना गया। इस साइट पर औसतन ढलान करीब 5 डिग्री है, जबकि लैंडर 10 डिग्री तक के ढलान पर सुरक्षित उतर सकता है। यहां बड़े पत्थरों की संख्या कम है और अधिकतर बोल्डर 0.3 मीटर से छोटे हैं। इस क्षेत्र में लगातार 11 से 12 दिन तक सूर्य की रोशनी मिलने की संभावना है। पृथ्वी के साथ रेडियो कम्युनिकेशन भी बेहतर बना रहता है, जिससे मिशन के दौरान संपर्क में दिक्कत नहीं आएगी।
सैंपल लेकर पृथ्वी पर लौटेगा चंद्रयान-4
करीब 2104 करोड़ रुपये की लागत वाले इस मिशन का उद्देश्य चंद्रमा की सतह से मिट्टी और चट्टानों के सैंपल इकट्ठा कर उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। इसके लिए दो अलग-अलग रॉकेट का इस्तेमाल किया जाएगा।
हेवी-लिफ्टर LVM-3
ISRO का भरोसेमंद PSLV
मिशन को दो स्टैक्स में बांटा गया है। स्टैक-1 में डिसेंडर मॉड्यूल और सैंपल लेकर ऊपर जाने वाला एसेंडर मॉड्यूल शामिल होगा। वहीं स्टैक-2 में प्रोपल्शन मॉड्यूल, सैंपल ट्रांसफर मॉड्यूल और पृथ्वी पर लौटने के लिए री-एंट्री मॉड्यूल शामिल किया गया है।
ISRO के वैज्ञानिकों के मुताबिक, चंद्रयान-4 अब तक का सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण भारतीय चंद्र मिशन होगा, जो भविष्य के मानव चंद्र अभियानों की दिशा तय कर सकता है।
DRASHTI JAIN 
